नए राज्यों में भाजपा

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devendraf.jpgहरियाणा और महाराष्ट्र में आये ताजा परिणामों से एक बात तो साफ़ हो ही जाती है कि भाजपा का का ग्राफ अभी ऊपर की ओर जा रहा है। दोनों राज्यों में भाजपा का आधार काफी कम था। खासकर हरियाणा में तो भाजपा को कभी भी गंभीरता से नहीं लिया गया था। पर इन नतीजों ने एक बार फिर से देश के विश्लेषकों में पेशानी पर बल डाल दिया है। कई इसे मोदी की जीत बता रहें हैं तो कइयों को यहाँ मोदी लहर का खत्म दिख रहा है। स्पष्ट है मीडिया और विश्लेषक इस समय दो विभिन्न प्रकार की भाषाएँ बोल रहे हैं। भाजपा विरोधी और भाजपा समर्थक शायद मीडिया भी दो भागों में बंट गया है। ये विभाजन लोकतंत्र कर लिहाज़ से कोई सार्थक छवि पेश नहीं कर रहा है पर शायद देश को मीडिया का ये चेहरा कुछ और समय के लिए देखने को मिल सकता है।
मोदी समर्थकों और विरोधियों की अतिरंजना अब इतनी बढ़ चुकी है कि कुछ अखबार और टीवी चैनल को देखकर साफ़ समझा जा सकता है कि इनमे किस तरह की खबर आएगी। चुनाव में जीत या हार के बाद की जाने वाली टिप्पणियां भी अब अपनी तटस्थता, निष्पक्षता खोती जा रहीं हैं। विश्लेषण निरर्थक और तथ्यहीन होते जा रहे है। ये कोई छोटे या काम लोकप्रिय शो या कॉलम में नहीं हो रहा है, अगर गौर किया जाए तो निरर्थक बहसों की शृंखला लम्बी होती जा रही हैं।

लौट कर वापस अगर चुनावों की ओर आया जाए तो ऐसा साफ़ लगता है की भाजपा एक मुकाम की ओर बढ़ने की कोशिश में है। वो नए-नए क्षेत्रों में अपने को आजमाने के मूड में है। महाराष्ट्र में पूरे सीट पर चुनाव लड़ने का मक़सद भी शायद यही है। पार्टी बंगाल और दक्षिण में उतरने से पहले अपने आप को उत्तर के उन दूर-दराज के क्षेत्रों में भी आजमा लेने चाहती है जहाँ वो कभी ठीक से खड़ी नहीं हो सकी। ऐसा करने से जहाँ उसके कैडर में आत्मविश्वास बढ़ता चला जाएगा वहीँ उसे नए और जुझारू नेता भी मिलते चले जाएंगे। महाराष्ट्र और हरियाणा भाजपा को ऐसे नेता देने के लिए तैयार हैं।

ये बिलकुल साफ़ है की इन चुनावों में कांग्रेस की हार उन्हें कुछ कदम पीछे धकेल देंगी। पर उनकी इस स्थिति के लिए वो खुद ही जिम्मेवार हैं। दस और पंद्रह साल का शासन देने के बाद आम जनता से जो उनका संवाद होना चाहिए था वो एकदम से नदारद दिखा। अंतिम समय पर जब ज्यादा जोर लागते हुए दिखाना चाहिए था तो उनके शीर्ष नेता कांतिहीन दिखे। नरेंद्र मोदी के लगातार रैलियों का जवाब देने के लिए उनके पास कोई मौजूद नहीं था।

क्षेत्रीय पार्टी भी इस बार कोई रंग दिखती नहीं दिखी। शिव सेना, मनसे, एनसीपी सभी बेरंग रही। हरियाणा में भी इनेलो और हजकां का भी यही हाल रहा। जीत के लिए लड़ रहीं इन पार्टियों को एक दुसरे से या तो मिलना होगा या गठबंधन कर वोट का प्रतिशत बढ़ाना होगा।

लोकतंत्र की ख़ूबसूरती यही है कि न यहाँ कोई स्थायी राजा होता है न कोई रंक। अपने-अपने कर्मों के हिसाब से ये पायदान बदलते रहता है। आज मोदी विजयी लग रहे है कल कोई और लग रहा होगा। पर मोदी के पास फिलहाल मौका है की वो जनता के अपेक्षाओं पर खरे उतरे ताकि जनता का फैसला आने दिनों में गलत साबित न हो।

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