महाराष्ट्र में महा अलगाव

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all-party1.jpgराजनीति में संभावना तो हमेशा से देखी जाती रही है पर संभावनाओं पर राजनीति भी महाराष्ट्र में जबर्दस्त ढंग से खेली गई। राज्य की तमाम पार्टियों ने एक मायने में अकेले चलने का फैसला कर लिया है। ऐसा नहीं है कि ये पार्टियां गठबंधन को बनाये रखने की कोशिश कर रही थी बल्कि हर पार्टी कहीं न कहीं गठबंधन को तोड़ने के लिए ही काम कर रही थीं। भाजपा-शिवसेना की विचारधारा पर आधारित दोस्ती हो या कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस का सत्ता बांटने वाली मित्रता सभी संभावनाओं के कारण ही बनी थी। अब जब इस बार गठबंधनों के टूट का मौसम है तब भी संभावनायें तलाशी जा रही है। चारो पार्टियों को यूं तो लगता है कि वक्त उनका है पर क्या ये होे पायेगा इसकी भी चिंता जरूर है।
कांग्रेस को जहां पृथ्वीराज चैहान के साफ छवि पर भरोसा है वहीं भाजपा को अपने लहर पर। शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस मराठा मानुष की बात करेंगे और शहरी के वनिस्पत ग्रामीण क्षेत्र पर ज्यादा ध्यान देंगे। भाजपा को सबसे ज्यादा परेशानी शिवसेना के बड़े भाई बने रहने से थी। दिल्ली में मोदी सरकार बनने के बाद से ही सभी राज्य इकाईयों में अब नहीं तो कब जैसी स्थिति बन गई थी। हरियाणा में भाजपा-हजका का गठबंधन टूटना भी इसी सोच का नतीजा था। महाराष्ट्र में भी भाजपा अकेले चलना चहती है और अपना आधार बढ़ाना चाहती है। सत्तारूढ़ दल होने के कारण कार्यकर्ताओं का भी काफी दबाव पार्टी के उपर है।

शिवसेना भी इस छटपटाहट में है कि किसी तरह सत्ता का स्वाद चखा जाये। उद्धव ठाकरे ने सार्वजनिक मंच से भी इस बाबत बात की है। पूरी पार्टी को ऐसा लग रहा है जैसे ये उनका सर्वश्रेष्ठ वक्त है। इस बार अगर वो अपने आप को बड़ा नहीं दिखायेंगे तो भाजपा उन पर हावी हो जायेगी। इस बात से बचने के लिए शिवसेना की ओर से भी गठबंधन बचाने की कोई खास कोशिश नहीं हुई।

राष्ट्रवादी कांग्रेस लोकसभा चुनावों के बाद से ही गठबंधन में ज्यादा सीट चाह रही थी। कांग्रेस के दो के मुकाबले चार सीट जीतने के बाद उनके अंदर भी गठबंधन को लेकर कोई खास उत्साह नहीं रह गया था। रही सही कसर पार्टी का कमान अजीत पवार के पास आने से बुरी हो गई। अजीत पवार कभी भी कांग्रेस के पिछलग्गू के रूप में पार्टी को नहीं देखना चाहते थे। नतीजा बिल्कुल सोचा समझा आया।

कांग्रेस की लोकसभा चुनावों में जबर्दस्त हार के बाद मंचन की स्थिति में है। पार्टी को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं को तरजीह देने की कवायद चल रही थी। पूरे राज्य में मजबूती की खातिर कांग्रेस भी राष्ट्रवादी कांग्रेस से दूरी बना रही थी। साफ-सुथरी छवि वाले मुख्यमंत्री को आगे कर वो अपने को आजमाना चाह रहे हैं।

इन सबों में राज ठाकरे की पार्टी भी है जो अब पहले के मुकाबले अपने आप को ज्यादा मजबूत मान रही होगी। कहीं से भी मुकाबले मेें नहीं दिख रहे राज अब मुकाबले में है। चुनावों के बाद की स्थिति में सभी को उनकी जरूरत पड़ सकती है।

चुनावी राजनीति अंतिम मुकाम में बेहद दिलस्प मोड़ पर पहुंच गया है। उम्मीद है सभी अपनी गाड़ी मंजिल पर पहुंचाने में लगे होंगे। अब कौन मंजिल पर पहुंचेगा ये परिणाम ही अच्छी तरह बतायेंगे।

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