लालू-नीतीश हिट

| No Comments | Google
lalu-nitish-new1.jpgकहते हैं कि डूबते को तिनके का सहारा। इस कहावत को अगर आज के राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो लालू और नीतीश पर बिल्कुल खरा उतरता है। यहां दोनों एक साथ डूब रहे थे और उन्हें अचानक एक साथ तिनका के रूप में एक-दूसरे का साथ मिल गया। फिलहाल उपचुनाव में उनकी जीत एक छोटे से तालाब से उनके सफलतापूर्वक निकलने जैसा है। मगर विधानसभा चुनाव जो कि एक विशाल नदी की तरह होगी उसमें घुसकर निकलना अभी बाकी है। पर इतना जरूर है कि ये परिणाम लोकसभा चुनावों के बाद से मुश्किलों में चल रहे लालू और नीतीश के मुंह पर एक मुस्कान जरूर बिखेर दी है।

कई दिनों से नीतीश मीडिया के सामने आने से बच रहे थे। उनके जवाबों से ज्यादा मीडिया के पास सवाल थे। नीतीश इससे असहज थे। पर उपचुनावों में जीत के बाद वे मीडिया के पास आये और बताये कि उनकी ये जीत क्यों हुई है। जीत के बाद उनकी पार्टी के लोग भी सामने आये। नीतीश को जीत का श्रेय देने में उनकी पार्टी के लोगों ने जरा भी देर नहीं की। जाहिर है नीतीश भी इस जीत का श्रेय लेना चाहते हैं। महागठबंधन का नेतृत्व भी नीतीश करना चाहते हैं। पर लालू का इस मुद्दे पर रूख अभी साफ नहीं है। उनका पक्ष अभी सामने आना बाकी है। कांग्रेस की क्षमता प्रदेश में नेतृत्व देने लायक तो है नहीं इसलिए उसे न तो लालू के कहे से ऐतराज है न नीतीश के कहे से।

उपचुनावों में जीत के बाद ये तो निश्चित है कि आने वाला विधानसभा का चुनाव कांटे का होने वाला है। टिकट बंटवारा से लेकर जातीय समीकरण सभी की महत्वपूर्ण भूमिका रहने वाली है। फिलहाल मोदी लहर पर सवार भाजपा शायद विधानसभा चुनाव तक इस लहर से उतर चुकी होगी। स्थानीय भाजपा नेता अगर जनता के बीच काम करते नजर नहीं आये तो उपचुनावों की जीत महागठबंधन विधानसभा में भी दोहरा सकता है। महागठबंधन में शामिल दल और उम्मीदवारों के जातीय समीकरण फिलहाल बिल्कुल फिट बैठ रहे हैं।

लालू-नीतीश के एक हो जाने से बिहार में फिर से राजनीति विकास से हटकर जातिवाद की ओर जाने की संभावना है। पिछले 8 साल से जातिवाद को हाशिये पर रखकर राजनीति करने की कोशिश की गई थी पर 2014 आते-आते ऐसा लग रहा है जैसे बिहार इससे उबरेगा नहीं। जब भी विकास की बात होगी तो नेता हार को जीत में बदलने के लिए साम्प्रदायिकता और जातिवाद का सहारा लेंगे ही। नीतीश ने अपने प्रेस कांफ्रेस में इस जीत को उन्मादी ताकतों के विरूद्ध जीत बताया। जबकि पिछले दो विधानसभा चुनावों में जीत को वे जंगलराज के खिलाफ जीत बताते थे। यानी जीतने के लिए उन्होंने कभी उन्मादियों का सहारा लिया तो कभी जंगलराज समर्थकों का। यही एक वाक्य काफी है ये समझने के लिए कि बिहार की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ रही है।

एक बड़ी लड़ाई की शुरूआत हो चुकी है और सभी खिलाड़ी तैयार है। मुकाबला दिलचस्प होने के साथ-साथ तल्ख होने की पूरी संभावना है। लालू-नीतीश के वार पर भाजपा के नेता क्या पलटवार करते हैं ये बिहार की जनता को जरूर देखना चाहिए।

Leave a comment