नीतीश लालू जुगलबंदी

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laloo_nitish.jpgदुश्मन का कोई भी दूसरा दुश्मन हमेशा अपना अच्छा दोस्त होता है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आजकल इसी जुमले को अमलीजामा पहनाने में लगे हैं। भाजपा के रूप में हालिया बने दुश्मन से लड़ने के लिए उनकी पार्टी ने अपने कुछ सबसे पुराने राजनीतिक दुश्मनों में शुमार राजद और कांग्रेस से गठजोड़ किया हे। इस गठबंधन की नैतिकता और उपयोगिता पर ढेर सारा चर्चा होता रहेगा मगर नीतीश कुमार की राजनीतिक दुश्मनी किस कदर अचानक पलटी मार ली इस पर भी बहस होगा। सत्रह सालों के गठबंधन के बाद भाजपा और जदयू दोनों एक दूसरे के लिए इतने अछूत हो गये हैं कि नीतीश ने पार्टी में चल रही गुटबाजी और बगावत को भी नजरअंदाज कर दिया है।
राजद, कांग्रेस के साथ जदयू के आ जाने से ये गठबंधन निश्चित तौर पर मजबूत और भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए को टक्कर देने वाला हो गया है। इस महागठबंधन से लालू और नीतीश दोनों को आने वाले उपचुनाव में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद होगी। या यूं कहें तो गलत नहीं होगा कि जीत ही इस महागठबंधन को आगे जीवित रख सकेगी। लोकसभा चुनावों में मिले वोटों के प्रतिशत को देखा जाये तो ये संभावना पूरी दिखती है। मगर कोई भी विपरित परिस्थिति इस महागठबंधन को ध्वस्त कर सकती है। उपचुनावों में अगर हार का सामना करना पड़ा तो ठीकरा लालू और नीतीश दोनों किसके सर फोड़ेंगे ये कहना ज्यादा मुश्किल नहीं है।

बिहार की राजनीति में लालू और नीतीश को एक राजनीतिक मंच पर देखना वाकई दिलचस्प होगा। सामाजिक न्याय के आन्दोलन से निकले ये दोनों नेता इस बार फिर से समाज के उन वर्गों के समर्थन की उम्मीद कर रहे होंगे जो या तो इनसे छिटक गया है या फिर इन दोनों में बंट गया है। भाजपा विरोध की राजनीति बदली हुई परिस्थिति में क्या गुल खिलायेगी ये देखना अभी बाकी है। उत्तराखंड के उप चुनावों में भाजपा की हार इन दोनों नेताओं को जरूर साहस दे रही होगी। पर बिहार का सामाजिक ताना-बाना उत्तराखंड से काफी अलग है।

नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में मिली बड़ी जीत के बाद भाजपा के हौसले बिहार में बुलंद है। पार्टी के नेताओं में अभी से ही मुख्यमंत्री पद की दावेदारी शुरू हो गयी है। राज्यसभा चुनाव में भाजपा ये मानकर चल रही थी कि राजद तटस्थ रह जायेगा और बागी प्रत्याशी जीत जायेंगे। ऐसा होने पर भाजपा प्रदेश नेतृत्व को मांझी सरकार के गिर जाने की भी उम्मीद थी। मगर परिस्थितियां बदली और राजद-जदयू नजदीक आये। यहां नीतीश कामयाब दिखे राज्यसभा की तीनों सीटों पर परचम भी फहरा लिया साथ में राजद के साथ स्पष्ट गठबंधन करने में भी कामयाब रहें।

नीतीश कुमार पिछले दो सालों में राजनीतिक दृष्टिकोण से सफलता और असफलता दोनों देख रहे हैं। लोकसभा में करारी पराजय असफलता है तो राज्यसभा में जीत सफलता। अब आने वाले उपचुनाव बतायेंगें कि नीतीश ज्यादा सफल हैं या ज्यादा असफल।

बिहार राजनीतिक परिपक्वता के मामले में सदा से देश को राह दिखाता रहा है। उम्मीद है इस बार भी मतदाता कुछ ऐसा फैसला लेंगे जिससे ये महसुस हो कि विकास जरूरी है अवसरवादिता। सभी दल और मतदाता तैयार खड़े हैं, पूरी उम्मीद है कि मुकाबला पहले के अपेक्षा ज्यादा दिलचस्प होगा।

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