नीतीश के पाले में लालू

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lalu-nitish-.jpgपहली पारी में एक सफल केन्द्रीय मंत्री का दायित्व निभाने के बाद नीतीश कुमार ने दूसरी पारी में मुख्यमंत्री मे रूप में अपने बेहतरीन फार्म में दिखे। इन दोनों पारियों में ऐसा कहीं से भी नहीं लगा कि नीतीश कोई गलती कर रहे हैं। जनता उनके गुण गा रही थी, सहयोगी उनके उठाये गये कदमों की प्रशंसा कर रहे थे, मीडिया भी उन्हें विकास के मोर्चे पर पूरे अंक दे रहा था और विपक्ष पूरी तरह से हताश, निराश और बिखरा हुआ था। लगभग 8 साल तक इसी स्थिति में चलने के बाद अचानक नीतीश कुमार अपने फैसलों से पार्टी के भीतर, मीडिया में और जनता के बीच हर जगह घिरने लगे हैं। जहां जनता ने लोकभा चुनाव में पार्टी को अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंचा दिया है वहीं उनके शान में कसीदे पढ़ने वाले उन्हीं के दल के विधायक बगावत का झंडा बुलंद कर रहे हैं।
लोकसभा चुनावों में मिली करारी हार और बगावत के बीच नीतीश ने अपनी नई पारी का ऐलान किया। बिहार में मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देकर उन्होंने अपनी एक नई पहचान गढ़ने की कोशिश की है। वो पार्टी में एक ऐसे अभिभावक की भूमिका निभाना चाह रहे हैं जिसके पास सरकार और संगठन दोनों की चाभी हो। अपने पहले निभाये गये सभी दायित्वों से ऐसा लगता है कि नीतीश ये भूमिका भी सफलतापूर्वक निभा लेंगे। पर राज्यसभा चुनावों में नीतीश के लिए फैसलों ने एक बार फिर उन्हें सबके निशाने पर ला खड़ा किया है। जिस जनादेश लेकर जदयू और नीतीश फूले नहीं समाते थे, लालू के जंगलराज के सबसे बड़े विरोधी के रूप में अपने को बताते नहीं थकते थे, इस चुनाव में ये दोनों बातें खत्म होती दिख रही है। जहां नीतीश खुद लालू को फोन कर उनके शरण में चले गये वहीं उनकी चुनावों में सहयोगी रही भाजपा बागियों को वोट कर रही है।

कहते हैं राजनीति में प्राथमिकतायें बदलते देर नहीं लगती। यहां बिहार में भी प्राथमिकतायें तेजी से बदल रही है। कल तक विकास की प्राथमिकता थी। आज जुगाड़ की प्राथमिकता है। कल तक जंगलराज का मुखालफत था आज गैर भाजपावाद का नारा है। ये सच है कि प्राथमिकता के साथ पाले भी बदल गये हैं। कल के धुर विरोधी आज के परम सहयोगी हैं।

पर नीतीश के साथ सबसे बड़ी चुनौती आने वाले विधानसभा चुनाव है। भले ही राज्यसभा चुनावों में जदयू के दोनों उम्मीदवार जीत गये हों मगर विधानसभा चुनावों में फैसला जनता को लेना है। न तो यहां कोई जुगाड़तंत्र काम आयेगा न ही लुभावने वायदे। जिन बातों और वादों का इस्तेमाल कर 2010 के चुनाव में अभूतपूर्व सफलता एनडीए गठबंधन को मिला था वो बातें और वादे जनता आने वाले चुनावों में जरूर तलाश करेगी। लालू के सहयोग पर नीतीश जनता को कैसे समझा पायेंगे ये देखना दिलचस्प होगा। लालू भी अपने पार्टी और वोटरों को नीतीश के बारे में क्या बतायेंगे इस पर भी जनता की निगाह होगी। अब तक लालू, नीतीश और भाजपा में कोई अंतर नहीं पाते थे पर अस्तित्व बचाने की मजबूरी में ऐसा लग रहा है कि दोनों को एक दूसरे के सामने घुटना टेकने पर मजबूर कर दिया है।

बिहार की राजनीति दिन-प्रतिदिन तेजी से बदल रही है। साम-दाम-दंड-भेद सभी का इस्तेमाल खुले में किया जा रहा है। नीतीश ने अपनी नई पहचान बनाने की कवायद शुरू तो कर दी है पर क्या ये उन्हें विधानसभा चुनावों में आशातीत परिणाम देगा, सबसे बड़ा प्रश्न यही है। लोकसभा में हार के बाद जनता का मूड क्या है ये शायद वो भली-भांति जानते होंगे।

ये लगभग निश्चित सा है कि नीतीश के नेतृत्व में जदयू में सब कुछ सामान्य नहीं हैं पर अगर सत्ता में रहने के बाद सबकुछ सामान्य नहीं है तो अगर विधानसभा चुनावों में अपेक्षित परिणाम नहीं आये तो पार्टी का क्या होगा? ये डर लगभग सभी को सता रहा है। उम्मीद है पिछले कुछ महीनों को भूलकर नीतीश पहले की भांति कुछ अच्छे निर्णय करेंगे जिससे एक बार फिर से बिहार में राजनीतिक स्थिरता कायम हो और गाड़ी जुगाड़तंत्र के पटरी उतर कर विकास की पटरी पर दौड़े। 

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