मोदी सरकार और नीतीश कुमार

| No Comments | Google
narendra-modi-win.jpgजबरदस्त जनमत के साथ नरेंद्र मोदी ने भारत के राष्ट्रीय फलक पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। ऐसा नहीं है कि मोदी की ये सफलता कोई अप्रत्याशित है उनकी सभाओं में उमड़े भीड़, समाज के कई वर्गों में उनके काम और समर्पण की स्वीकार्यता और विपक्षी नेताओं के तीखे बयान अक्सर ये दर्शा जाते थे कि मोदी ही इस चुनाव के सबसे बड़े खिलाडी हैं। पर जिस तरह का प्रचंड बहुमत मोदी को मिला है वैसा शायद ही किसी ने कल्पना की हो। मोदी के कट्टर समर्थक भी भाजपा को 280 सीटों के ऊपर सोचने में एक विराम जरूर लेते थे। इस जीत ने मोदी को को प्रधानमन्त्री तो बनाया ही है देश की सड़-गल चुकी राजनीतिक समीकरणों को भी नए ढंग से लिखने का काम किया है।
इस ऐतिहासिक जीत ने साबित कर दिया है कि धर्मनिरपेक्षता का घिसा-पिटा फार्मूला अब जनता धीरे-धीरे छोड़ने का मन बना रही है। इस बार ये जैसा दिख रहा है शायद अगली बार और अच्छे ढंग से दिखे। पर लगता है इस  परिवर्तन को हमारे कुछ नेता अभी भी महसूस नहीं कर पा रहे हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि बिना धर्मनिरपेक्षता के इस देश में राजनीति चल ही नहीं सकती। मायावती की पार्टी के साफ़ हो जाने, मुलायम की पार्टी के परिवार तक सिमट जाने, लालूऔर नीतीश दोनों की पारी के बेहद फीके प्रदर्शन के बाद भी इन नेताओं का लगता नहीं की मोह भंग हुआ है। ये अब भी नरेंद्र मोदी को अछूत और अपने को धर्मनिरपेक्षता का सबसे बड़ा अलम्बरदार समझ रहे है।

nitish-k.jpgमायावती ने जहाँ प्रेस कॉफ्रेंस कर अपनी भड़ास निकाली वही शरद यादव नीतीश और लालू को एक साथ लाने की ओर इशारा कर रहे थे। ये बातें नीतीश कुमार के इस्तीफा के बाद सामने आई है। नरेंद्र मोदी और भाजपा की बिहार में प्रचंड जीत के बाद मोदी को गठबंधन के दिनों से ही कोसते आ रहे नीतीश कुमार ने  इस्तीफा दे दिया। अब ये नैतिक जिम्मेवारी है या राजनीतिक छल ये तो आने वाले दिनों में खुलासा होगा पर देश की इस जीत के बाद बिहार में जरूर मजा कुछ फीका हो गया।

modi-var.jpgमोदी ने अपने विजय के बाद वड़ोदरा और वाराणसी दोनों जगह की जनता को धन्यवाद दिया और आगे की राजनीति के बारे में भी कुछ बातें जनता के बीच कही। उनका मुख्य जोर सबको साथ लेकर चलने पर था। पर क्या विरोधी उनके साथ चल पाएंगे। उनको हराने के लिए किसी भी हद तक पहुँच जाने वाले क्या उनका किसी भी कीमत पर साथ दे पाएंगे। लगता तो नहीं है।

छदम धर्मनिरक्ष लोगों की दूकान लगभग बंद होने की कगार पर है। वैसे नेता, पत्रकार और बुद्धिजीवी निश्चित रूप से अपने को हाशिये पर पा रहे होंगे और कुछ ऐसा करने की जुगत में होंगे जहाँ से उनकी धर्मनिरपेक्षता की दूकान किसी तरह चलती रहे। देश आगे बढ़ चूका है।  और ये जानना ज्यादा मुश्किल नहीं है कि आने वाले दिन नीतीश के लिये अच्छे होंगे या मोदी के लिये। देश का युवा अपनी राह चुन चूका है। 

Leave a comment