साम्प्रदायिक चुनाव !

| No Comments | Google
janmabhoomi.jpgशांत और बिना किसी मसाले के चल रहे चुनाव प्रचार में अचानक रंग और स्वाद दोनों आ गया है। अब तक विकास और धर्मनिरपेक्षता का ढोल पीट रही पार्टियां मतदान के ठीक पूर्व अपने चिर-परिचित एजेंडे पर लौटती दिखाई दे रही हैं। सोनिया गांधी दिल्ली में शाही इमाम से मिलकर अपने लिए समर्थन जुटा रहीं हैं। दूसरी ओर कोबरापोस्ट के स्टिंग ऑपरेशन ने भी एकरस से चल रहे चुनाव के माहौल में साम्प्रदायिकता का तड़का लगाने का काम किया है। अब इन कोशिशो को जनता किस तरह लेती है और क्या निर्णय सुनती है ये तो चुनाव परिणाम आने के बाद पता चलेगा मगर ये तय तो जरूर हो गया कि बिना साम्प्रदायिकता के तड़के के इस देश में चुनाव फिलहाल सम्भव नहीं हैं।
इन कोशिशो में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का नाम भी आता है जो पिछले कुछ दिनों से पिंक रेवोलुशन के बारे में बाते कर रहे हैं। उनकी बातों का मतलब कहीं न कहीं किसी खास तबक़े को परेशान कर रहा है। यानि घुमा-फिराकर उन्ही बातों को कहने की कोशिश जो बार-बार चुनावों में आजमाया जा चूका है। कुछ खास वर्ग को हमेशा से वोट बैंक के रूप में सभी राजनितिक पार्टियां देखती रही हैं। इनमे मुस्लिम हैं, दलित हैं, अगड़ा हैं, पिछड़ा हैं और जाने क्या-क्या। इन्ही बातों को लेकर राजनीतिज्ञ हमेशा से मंदिरो में, मजारों पर और गुरुद्वारों में जाते रहे हैं। इन जगहों पर जाने का मकसद कतई कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं होता बल्कि यहाँ जाकर इन धर्म के मानने वाले लोगों से वोट प्राप्त करना होता है।
 
shahi-imam-soniya.jpgइसी क्रम में सोनिया गांधी ने शाही इमाम से मुलाकात की है। शाही इमाम ने भी उन्हें मायूस नहीं किया है, उन्होंने अपना पूरा समर्थन कांग्रेस पार्टी को दे दिया है। ऐसा नजारा भाजपा में भी दिखा है वो भी चुनाव पूर्व और चुनाव कि घोषणा के बाद भी बावा रामदेव और और कई अन्य हिन्दू संतो से मिलती रही है। कुम्भ का मेला से लेकर अयोध्या तक को चुनावी सियासत का अखाड़ा बनाया गया है। इसी कारण कोबरापोस्ट ने अपने स्टिंग के लिए रामजन्मभूमि का मुद्दा चुना। उनके संपादक और बाकियों को भी पता है कि ये मुद्दा वोटो का ध्रुवीकरण कर सकता है। इस समय पर इसका जनता के सामने पेश किया जाना कई सारे सवाल उठाता है। किसी न किसी को फायदा पहुँचाने की धारणा को बल मिलता है।

निश्चित रूप से किसी न किसी को फायदा तो जरूर पहुंचेगा। भाजपा और कांग्रेस दोनों इसमें फायदा ढूंढ रहे हैं और उम्मीद है दोनों को फायदा मिलेगा भी। सपा और बसपा ऐसी राजनीति में कभी पीछे नहीं रहे। उन्होंने भी जाकर वोटबैंक की राजनीति की है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का टीका और टोपी वाला जुमला शायद ही कभी भुलाया जायेगा। प्रतीकों का राजनीतिक गलियारे में प्रवेश कराने और उनका सधा हुआ इस्तेमाल करना कोई हमारे राजनेताओं से पूछे।

बात निकली है और इसे रोकना अब आसान नहीं है। ये अब निश्चित तौर पे दूर तलक जायेगी। अब जनता को तय करना है कि वो साम्प्रदायिकता के नाम पर उम्मीदवारो को चुनेगी या फिर विकास के नाम पर मुहर लगाएगी। 

Leave a comment