रामकृपाल का भाजपा प्रेम

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ramkripal.jpgचुनावी मौसम में गढ़ने वाले तर्कों कि बाढ़ सी आ गयी है। नेता पाला बदलते जा रहे हैं और इसके लिए एक से बढ़कर एक तर्क को पेश कर रहे हैं। कल के सांप्रदायिक नेता आज धर्मनिरपेक्ष और समावेशी बन रहे हैं, वहीँ समावेशी समझे जाने वाले कई लोग भीड़ में अकेले चलने को मजबूर हो गए हैं। इन स्थितियों को जनता को समझाने के लिए नेताओं ने तर्क गढ़ने की दुकान खोल ली है। रामकृपाल यादव भी ऐसे नेता में से एक हैं। कभी भाजपा और नरेंद्र मोदी के विरोध के अगुआ रामकृपाल अब नमो-नमो भजने लगे हैं। चंद दिनों पहले तक नरेंद्र मोदी के खिलाफ बहुत ही कड़े शब्दों का प्रयोग करने वाले रामकृपाल के तर्क भी रामविलास पासवान सरीखे ही हैं।
भाजपा इस दौर को अपने और नरेंद्र मोदी के लिए सर्वश्रेष्ठ दौर मान रही है। पार्टी को इस वक़्त नरेंद्र मोदी के पक्ष में जबर्दस्त लहर दिखाई दे रही है। इस रथ पर सवार होकर भाजपा के नेतागण चुनाव में सफलता पा लेना चाहते हैं। दुसरे दलों के नेता भी शायद इस लहर से इत्तेफ़ाक़ रखने लगे हैं। इस कारण हर वो नेता भाजपा में आ रहा है जो या तो असंतुष्ट है या फिर महत्वकांक्षी है। अगर नेताओं की भागमभाग पर गौर किया जाए तो ये मानना ज्यादा मुश्किल नहीं कि भाजपा अन्य राजनीतिक दलों से आगे दिख रही है।

मिशन २७२ के लिए भाजपा को भी पासवान या फिर रामकृपाल जैसे अपने विरोधियों से कोई परहेज नहीं है। सत्ता में आना उसके लिए भी अब विचारधारा का प्रश्न नहीं रह गया है। यही कारण है कि रामकृपाल या पासवान के नजदीक आने के उन लोगों ने भी अपने किस्म के तर्क ढूंढ लिए हैं। कभी कुनबा बढ़ने के नाम पर तो कभी मोदी की लोकप्रियता का बहाना बनाकर ऐसे लोगों को नजदीक लाने के तर्क ढूंढ लिए गए हैं। पर क्या जनता ऐसे तर्कों को स्वीकार करेगी ? इसका जवाब तो चुनाव के बाद ही लगेगा पर तब तक के लिए तो ये तर्क सुनने तो पड़ेंगे ही।

शायद ऐसा लगता है कि बिहार में 12-१३ सीटों पर लड़ने वाली भाजपा को पुरे 40 सीटों पर उम्मीदवार जुटाने में कठिनाई महसूस हो रही थी। पासवान और उपेन्द्र कुशवाहा से हुए गठबंधन के बावजूद भी पार्टी के पास जिताऊ उम्मीदवारों की कमी महसूस कि जा रही थी। यही कारण है कि बाहर से आने और विपरीत विचारधारा का होने बावजूद पार्टी ने रामकृपाल को पाटलिपुत्र जैसा महत्वपूर्ण संसदीय सीट का उम्मीदवार बनाया है।

आने वाले समय में उम्मीद है और ढेर सारे नेता पाल बदलेंगे। कुछ और नए तर्क भी सुनने को मिलेंगे। ये सिलसिला चुनाव होने के बाद भी चलेगा। सरकार बन जाने बाद ही इस पर विराम लगेगा। रामकृपाल तो तर्क दे चुके अब देखते हैं आगे किसकी बारी है।

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