एलान-ए-चुनाव और ग़दर

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aap.jpgभारत के सबसे बड़े पर्व का आगमन बस होने ही वाला है। आम चुनाव की तिथियों के घोषणा के बाद अब इस पर्व को कैसे मनाएं इसकी तैयारियां जोर-शोर से शुरू हो जाएंगी। चुनाव आयोग के हिंसा मुक्त चुनाव कराये जाने के संकल्प के बावजूद स्थितियां आसान नहीं रहने वाली हैं। इसकी एक बानगी दिल्ली से लेकर लखनऊ तक दिख गयी है। भाजपा और आप के कार्यकर्ताओं ने जिस तरह सड़कों पर आकर अपने-अपने ताकत का बेहद घिनौना नमूना पेश किया है उसे किसी भी तरह स्वस्थ और परिपक्व लोकतंत्र में स्वीकार नहीं किया जा सकता। आप कार्यकर्ताओं ने जिस तरह संगठित होकर छापामारों की तरह आचरण किया वो कहीं से भी लोकतंत्र के मर्यादाओं पर खरा नहीं उतरता।
चुनाव आयोग को शायद इन बातों को इस बार आसानी से रफा-दफा करने के मूड में नहीं दिख रहा है। उसने गुजरात से लेकर दिल्ली और उत्तर प्रदेश सभी की रिपोर्ट मंगवाई है। चुनावों के तारीख की घोषणा के बाद ऐसी किसी भी घटना की मिसाल नहीं मिलती है। इस कारण ये हिंसा और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। चुनाव आयोग के साथ-साथ मीडिया और खास कर जनता को तो इसका संज्ञान जरूर लेना चाहिए। इस मामले में शामिल नेता और कार्यकर्ताओं को चुनाव में सबक सीखा कर जनता ये साबित कर सकती है कि भले ही नेता और राजनीतिक पार्टियां परिपक्व नहीं हो पाएं हों पर जनता पहले भी परिपक्व थी और आज भी परिपक्व है। ऐसे किसी भी तत्व को वो प्रश्रय नहीं देगी जो संवाद के बदले हिंसा का रास्ता अख्तियार करने के लिए सोचते हों।

राजनीति का ये खेल समझे जाने की जरूरत है। शीला दीक्षित के सफाये बाद अरविन्द केजरीवाल को एक मजबूत विपक्षी की तलाश है जिस पर हमले कर वो सुर्ख़ियों में रहे और साथ ही साथ उनका कद भी बढ़ता रहे। अपने इस कोशिश में वो कामयाब भी रहे हैं। उन्होंने नरेंद्र मोदी पर निशाना साध रखा है और भाजपा हमलावर है। अरविन्द अच्छी तरह जानते है कि भाजपा जितने भी हमले करेगी वो उतने ही मजबूत होते जायेंगे। वो जानते हैं कि भाजपा के किये गए पलटवारों से उनका कैडर मजबूत होगा।

ये सारा मसला गुजरात से शुरू हुआ जो मोदी का गढ़ माना जाता है। केजरीवाल यहाँ पुलिस द्वारा मॉडल कोड ऑफ़ कंडक्ट के लागू होने के बाद रोके गए। सवाल उठता है कि क्या गुजरात से केजरीवाल यूँ ही शांति से लौट आते ? काया वो राजनीतिकरने का कोई भी मौका छोड़ सकते थे ? अगर नहीं तो, ये घटना नहीं होती तो कोई और घटना होती। पर तनाव तो होता ही।

अब चुनाव आयोग की जिम्मेवारी है कि इस तरह की अराजक स्थिति से कैसे निपटे। चुनाव साफ़-सुथरे ढंग से अपने अंजाम तक पहुंचे इसके लिए उन्हें कमर कसनी होगी। उम्मीद है चुनाव आयोग इस बार ऐसी कोई मिसाल पेश करेगा जिससे चुनावी स्थिति सुधरे, वरना हिंसक चुनाव देखने की आदत तो जनता को है ही।

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