आडवाणी जी का हठ

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lk_advani.jpgसियासत में रूठने मामने का खेल कोई नया नहीं है। अक्सर लोग रूठ जाते हैं और पसंद की चीज मिल जाने पर मान भी जाते हैं। चुनाव के मौसम में ये रोग कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता है। लालकृष्ण आडवाणी भी लगता है इसी रोग से ग्रस्त हो गए हैं। पिछले कुछ समय से आडवाणी इतने बार रूठे और माने हैं कि गिनती मुश्किल हो गयी है। अब इस बहाने वो अपनी फजीहत करा रहे है या पार्टी की ये कहना फिलहाल मुश्किल है। शायद इस बात का असली आकलन शायद चुनाव परिणाम के बाद ही पता चल सकेगा।

जब मानना पड़ता ही है तो रूठना क्यों ? आडवाणी से ये सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए। अगर विरोधियों के बयानों को दरकिनार कर भी दिया जाए फिर भी ये जानना दिलचस्प है कि आखिर ऐसी कौन सी बात है जिसे लेकर आडवाणी बार-बार रूठते है और बाद में किसी दबाव या फिर कुछ अपने पसंद का करवा लेने के बाद मान भी जाते हैं।मीडिया आकलन के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी इस बार शायद चुनाव में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने जा रही है। अब इस मौके पर पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेता अगर इस तरह से व्यवहार करें तो विरोधियों में किस तरह का सन्देश जा रहा होगा जानना ज्यादा कठिन नहीं है।

कांग्रेस और अन्य दुसरे दलों को इस मौके पर आडवाणी जी से खास लगाव हो जाता है। ये लगाव होना भी चाहिए, चुनाव जीतने में विरोधी की हर उस नस को दबाया जाता है जो कमजोर हो। मीडिया में भी इस प्रकरण की भरपूर चर्चा है। बारात में फूफा जी के रूठने जैसे मुहावरे बारम्बार प्रयोग किये जा रहे हैं।

पर लगता नहीं कि मामला सिर्फ एक संसदीय सीट से जुड़ा होगा। इसके पीछे आडवाणी जी की कोई न कोई बड़ी पीड़ा या व्यथा रही होगी। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह और नरेंद्र मोदी से शायद उनकी कोई संवादहीनता रही होगी। उम्र के इस पड़ाव में आडवाणी जी के साथ पार्टी जरूर अच्छा व्यवहार करना चाहेगी। आडवाणी जी के साथ किया गया व्यवहार ही पार्टी के दुसरे पंक्ति के नेताओं के लिए सम्मान पाने का मौका होगा। क्योकि मतदाता बड़े गौर से सब देख रहा है। साथ ही साथ वो धारणा भी बना रहा होगा कि एक बड़ी पार्टी अपने बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार कर रही है।

उम्मीद है चुनाव से पहले ये रूठने, मनाने का आखिरी दौर होगा। अब सभी दल गम्भीरतापूर्वक चुनाव की तैयारी में व्यस्त हो जायेंगे। जीत, हार चाहे किसी भी दल या व्यक्ति की हो पर सम्मान देने की परंपरा अपनी जगह हमेशा की तरह कायम रहेगी।

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