पाला बदलते पासवान

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ramvilas.jpgशायद एक बार ऊंट किस करवट बैठेगा ये कहना आसान है पर राजनीतिज्ञ कब और किस पाले में चले जाएँ ये कहना बहुत ही मुश्किल है। इसलिए ये कहना ज्यादा मुश्किल नहीं कि अवसरवादिता के लिए राजनीति से बेहतर जगह इस दुनिया में है ही नहीं। कल तक भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी को पानी पी-पी कर कोसने वाले रामविलास पासवान अब उन्ही के पाले में आने की जुगत में हैं। अपने संवाददाता सम्मलेन में पासवान ने इन्ही बातों का संकेत दिया है। शायद सत्ता सूंघने की काबिलियत पासवान में किसी और से अधिक है तभी वो अपने सीमित प्रभाव के बावजूद यूपीए और एनडीए दोनों में प्रभावशाली मंत्रालय पाने में कामयाब रहे है। और अब जबकि उनकी पार्टी बिलकुल हाशिये पर है वो बिहार की स्थानीय भाजपा के कुछ नेताओं के विरोध के बावजूद एनडीए में जगह बनाते नज़र आ रहे है।
बिहार की राजनीति इन दिनों एक ऐसे मुकाम पर है जहाँ अपने, पराये और पराये, अपने हो रहे हैं। एक ओर जहाँ लालू प्रसाद यादव अपने कुनबे को जोड़े रखने की कवायद कर रहे वहीँ अपने आप को दुबारा बिहार के राजनीतिक मंच पर अव्वल लाने के लिए गठबंधन के साथियों की तलाश कर रहे हैं। कांग्रेस के साथ गठबंधन के सवाल पर वो बिलकुल साफ राय रखते है पर इस बार कांग्रेस के रूख में उनको लेकर साफगोई नहीं दिख रही है। पासवान इस उहापोह की स्थिति में अपने लिए मोल-भाव की साफ़ स्थिति देख पा रहे हैं। वो भाजपा के साथ जाएँ या कांग्रेस के साथ मगर जनता के सामने वो राजनेताओं की वही बनी बनाई परंपरागत अवसरवादी छवि पेश कर रहे हैं।

रामविलास पासवान और उनके बेटे चिराग पासवान ने अभी कुछ मूलभूत तर्क जनता के सामने रखे हैं जैसे कि नरेंद्र मोदी को क्लीनचिट मिल गयी है वगैरह-वगैरह। मगर एनडीए में शामिल होने के बाद वो पिछले दस सालों के मोदी विरोध के बारे में जनता को चुनाव के दौरान कैसे समझाने में कामयाब होंगे ये देखना दिलचस्प होगा। भाजपा को भी ढेर सारे सवालों के लिये तैयार रहना पड़ेगा। मोदी के धुर विरोधी रहे पासवान को अपने से जोड़ने पर फजीहत होने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।

इस सभी सम्भावनाओं में नीतीश कुमार अकेले खड़े दिखाई दे रहे हैं। उन्हें भी गठबंधन के लिए साथियों की तलाश है मगर कामयाबी उन्हें फिलहाल मिलती दिख नहीं रही है। पिछले कुछ महीनों में कांग्रेस पर नरम दिख रहे नीतीश ने एक बार फिर से कांग्रेस पर प्रहारों का सिलसिला शुरू कर दिया है। ये भी अपने किस्म की अनोखी अवसरवादिता है। लालू की पार्टी में टूट से भी नीतीश को कोई खास फायदा होता दिख नहीं रहा है। आधे से ज्यादा विधायक वापस राजद में लौट चुके है और पार्टी तोड़ने का इलज़ाम भी नीतीश पर चस्पा हो गया है। अब नीतीश आगे क्या रणनीति बनाएंगे ये आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति की दिशा तय करेगा।

बिहार हमेशा से राजनीतिक रूप से काफी संवेदनशील रहा है। देश की राजनीति तय करने में हमेशा से बिहार की प्रमुख भूमिका रही है। आने वाला आम चुनाव भी इससे अछूता नहीं रहने वाला है। बिहार में बिछी बिसात ही देश के राजनीतिक मिजाज को तय करेगी। अब जब बिसात बिछ चुकी है और मोहरे अपनी जगह पर सज रहे है लोगों में चाल देखने की जिज्ञासा जग चुकी है। अब देखना सिर्फ ये है कि चल सिर्फ अवरवादिता की होगी या गम्भीर मुद्दे भी तलाशे जायेंगे।

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