दम दिखाते राहुल

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rahul_gandhi_CII.jpgभारत की राजनीति विरोध पर आधारित है. यहाँ पक्ष और विपक्ष किसी मुद्दे पर एकमत हो ऐसा मौका बिरले ही आता है. दोनों ही पक्ष को सिर्फ और सिर्फ अपने नेता ही अच्छे लगते हैं. अपने दल के नेताओं के विचार, शैली और व्यक्तित्व के आगे दुसरे दल के लोग बौने लगते हैं. ठीक यही बात राहुल गाँधी और नरेन्द्र मोदी के सन्दर्भ में सच साबित हो रही है. भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल अपने-अपने नेताओं को जनता के सामने पेश करने और उसे एक दुसरे से बेहतर साबित करने की होड़ में कुछ इस कदर लगे हैं कि उन्हें दुसरे की कोई भी अच्छाई नज़र नहीं आ रही है. सीआइआइ के मंच पर राहुल के दिए गए भाषण में जहाँ कांग्रेस पार्टी बहुत कुछ देख रही है वही भाजपा को इसमें कुछ भी खास नज़र नहीं आ रहा है.
हर नेता, हर दल का अपना एक सोच होता है. वो इसी सोच के सहारे आगे बढ़ते है. राहुल इसमें कोई अपवाद नहीं है. उनके सामने कांग्रेस पार्टी की की एक लम्बी विरासत है,सोच है. देश में अधिकाँश समय कांग्रेस पार्टी सत्ता में रही है इसलिए उनके सामने शाशन और व्यवस्था में मौजूद खामियों के बारे में भी एक सोच है. उस सोच को वो कई मौके पर प्रकट भी कर चुके हैं. उनके आलोचक अक्सर ये कहते मिल जायेंगे कि उनके पास सिर्फ समस्याओं की फेहरिस्त है पर समाधान है नहीं. पर आलोचक भूल जाते है कि किसी भी समस्या का समाधान एक दिन में नहीं मिल सकता है. समाधान पाने कि प्रक्रिया सतत और अनवरत है. ये लगातार चलती ही रहती है. साथ ही साथ कोई भी समस्या का कोई एक ही हल हो ऐसा मुमकिन नहीं. समाधान हमेशा बहुआयामी होगा और इसे लागातार आजमाने की जरूरत पड़ती है.

राहुल को उनके आलोचक स्वप्नदृष्टा मानते है. उन्हें लगता है कि सारे समाधान बस वो ही सुझायेंगे. क्या लोकतंत्र में एक व्यक्ति से इतनी उम्मीद की जा सकती है? क्या राहुल को इतना जल्द किसी तमगे से सुशोभित किया जा सकता है? क्या उन्हें सिर्फ इसी बात पर ख़ारिज किया जा सकता है कि वो व्यवस्था में परिवर्तन की बात करते है? शायद नहीं. राजनीति में कोई भी विचार कमजोर नहीं होता, कोई भी वाक्य बेकार नहीं होता, कभी भी और कोई भी वाक्य कभी भी चल सकता है और जनमानस को उद्वेलित कर सकता है.

राहुल इस बात को लेकर भी निशाने पर रहे कि वो जनता के बीच नहीं आते है, संवाद स्थापित नहीं करते है. सीआइआइ के मंच पर आकर उन्होंने ये धारणा तोड़ने कि कोशिश की है. उम्मीद है आगे भी वो देश के विभिन्न वर्गो के बीच जायेंगे और अपनी बात रखेंगे.

कई लोग उनकी आलोचना करते है देश के प्रति उनकी राय स्पष्ट नहीं है. उन्हें सारे मुद्दों पर अपनी राय रखनी चाहिए. कई लोग उन पर एक खास परिवार का होने के कारण राजनीति में एक मुकाम मिलने का इलज़ाम भी लगाते है. इसके विपरीत भी इलज़ाम लगते रहे है कि वो किसी पद को लेने के प्रति अनिच्छुक है. पर क्या ये किसी के प्रति ज्यादती नहीं है. खासकर लोकतंत्र में जहाँ जनता ही सारे फैसले करती है. क्या किसी नेता को ये ये अधिकार नहीं होना चाहिए कि वो अपने हिसाब से अपनी राजनीति करे. अगर वो गलत होगा तो जनता का विश्वास उसे कभी नहीं मिलेगा.

राहुल ने सीआइआइ के मंच से भाजपा और मोदी दोनों को अपनी उपस्थिति का एहसास कराया है. उनका ये अवतार निश्चित रूप से कई लोगों को भौचक्का कर दिया होगा. आगे कांग्रेस पार्टी की चुनावी रणनीति क्या होगी इसकी एक झलक यहाँ मिल गयी है. उम्मीद है आगे मुकाबला दिलचस्प होगा और भारत के मतदाता के पास विकल्प होगा की वो समावेशी विकास और सद्भावना जैसे शब्दों के बीच अपने आप को खोज सके.

ढ़ेर सारे युवा मतदाता आने वाले आम चुनावों में अपने आप को जोड़ेंगे. वो अपने और देश के लिए एक सही विकल्प की तलाश करेंगे. भारत के राजनितिक इतिहास में पहली बार इतने बड़े संख्या में जुड़ रहे वोटर ही ये तय करेंगे की भविष्य का नेता किस तरह का हो.

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