अशांति की हद

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Mumbai Police vehicle.jpgअशांति चारो ओर है. देश के पूर्वी भाग असम से लेकर पश्चिमी भाग मुंबई तक इसकी लपेट में है. कहीं हिंसा तो कहीं उसके जवाब में प्रतिहिंसा. पर राजनीति रुक नहीं रही है. वो अपने चिर परिचित अंदाज़ में चली जा रही है. आज की परिस्थितियों में जब शांति और सौहार्द मुख्य मुद्दे होने चाहिए थे हमारी राजनितिक पार्टियाँ इस बात में मशगूल है कि इस अशांति का लाभ कैसे उठाया जाए. लोगों की जान जाये तो जाये पर सियासत की दुकान चलती रहनी चाहिए. मुंबई के आजाद मैदान में हुई हिंसा के बाद हुई राजनीति इसी बात की ओर इशारा करता है.

हमारा देश विभिन्न संस्कृतियों और विभिन्न धर्मों का मिलन स्थल है. दुनिया का ऐसा कोई प्रमुख धर्म नहीं है जो हमारे देश में नहीं मिलता हो. यहाँ के लोग सदियों से एक दुसरे के साथ मिल-जुल कर रहते आये है. पर राजनीति ने इस भाईचारे को हमेशा डसा है . चाहे वो देश की बंटवारे की घटना हो या मंदिर मस्जिद का मामला.

मुंबई के पुलिस कमिश्नर को हटा दिया गया है. इसमें भी राजनीति खोजी जा रही है. अवसरवादिता पूरी तरह से हावी है. फिर से अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक जैसे शब्दों से खेला जा रहा है. अपने अपने पाले देखे जा रहे है. किसके पक्ष में बोलने से फायदा होगा इसे टोला जा रहा है.

क्या भारत इसी तरह आगे की राह तय करेगा? क्या हमारा देश कभी भी परिपक्व लोकतंत्र बन पायेगा? राजनितिक दल वोट बैंक की राजनीति से उठ पाएंगे? लगता तो नहीं है. क्योंकि ज्यों ज्यों देश की आबादी बढ़ रही है, समस्याएं बढ़ रही है, शायद लोगो का गुस्सा भी बढ़ रहा है. अपने हिस्से की रोटी छीन जाने की दास्तान हम असम में देख रहे है. देश के दुसरे हिस्सों में ये दोहराया न जाये इसकी पूरजोर कोशिश होनी चाहिए. राजनितिक पार्टियों के इतर भी समाधान खोजने होंगे. कानून व्यवस्था का पालन बिलकुल सधे अंदाज़ में होना चाहिए, न की राजनितिक चश्में से देखते हुए अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने चाहिए. कानून की दृष्टि में सभी बराबर है और इसे तोड़ने वाला को सिर्फ और सिर्फ अपराधी मानना होगा.

मुंबई जैसे हादसे देश के लिए सबक है. पुलिस के लिये, राजनितिक दलों के लिये, साथ ही साथ हर उस इंसान के लिये जो कानून का राज चाहता है. हिंसा के लिये हमारे समाज में कोई स्थान न हो इसकी कोशिश हर उस आम आदमी को करनी होगी.

अशांति के निपटने का सबसे कारगर तरीका है हमारी युवा पीढ़ी को साम्प्रदायिकता से दूर ले जाना. और ये तब हो पायेगा जब धर्म और जात के नाम पर वोट माँगना और देना दोनों बंद हो जाये. राजनीति, धर्म के बदले, विकास और सद्भावना पर आधारित हो जाये. यकीन मानिए जिस किसी भी दिन ऐसा हो गया हमारा देश एक बार फिर सोने की चिड़िया में तब्दील हो जाएगा.

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हमारे राजनितिक दल जिसे हम करता धरता मानते है. वो कभी हमें सिर्फ हिन्दुस्तानी नहीं बनने देंगें शानदार लेख.

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