भूमिका की तलाश

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Gadkari Sharad - pht.jpgआज यूँ लगने लगा है जैसे सारे भारतीयों में एक राजनितिक महत्वकांक्षा होती है. ये महत्वकांक्षा समय के साथ बढती है. और एक समय ऐसा भी आता है जब महत्वकांक्षाएं फुट पड़ती है. तमाम जिंदगी की कमाई हुई दौलत, शोहरत, इज्ज़त सभी कुछ को दांव पर लगा कर अपनी इस लालसा को पूरा करने की कोशिश करते है कि राजनितिक चकाचौंध के बीच रहें. आज चल रहे जनांदोलनों को देखकर तो कम से कम यही लगता है. सामाजिक उत्थान के इन आंदोलनों में राजनितिक दलों के नुमाइन्दो की मौजूदगी कुछ यही दास्तान सुना रही है.


गैर राजनितिक आन्दोलनों को राजनितिक समर्थन मिलना कोई नई बात तो नहीं है. पर ऐसे आन्दोलन में किसी ख़ास राजनितिक विचारधारा के लोगो का ही पहुंचना बड़ा संदेश दे जाता है. यह संदेश है भटकाव की. समय से पहले अपने मकसद को बिखरते देखने की. जल्द से जल्द राजनितिक गलियारों में पहुँचने की.

कभी किसी के राजनितिक पार्टी बनाने का एलान तो कभी किसी के राजनितिक दलों का समर्थन. क्या देश अब इसी मॉडल पर आगे बढेगा? बिना राजनितिक सोच वालों की भूमिका सिमटती चली जायेगी? क्या सामाजिक कल्याण के लिए राजनितिक दलों की बैसाखी पकडनी जरूरी है? इन सवालों पर विचार किया जाना बेहद जरूरी है.

अन्ना टीम के बाद रामदेव का राजनितिक मैदान में कूदना इनके उतावलेपन को दीखता है. लम्बी लड़ाई की बात कहने वाले आधे में ही मैदान छोड़ चले है. अब इनके आन्दोलनों को कौन पार लगाएगा यह भी सवाल है. पर इतिहास गवाह है की मुद्दे मरते नहीं है. उन्हें उठाने वाले बदल जाते है. भ्रष्टाचार का मुद्दा भी मरेगा नहीं वो किसी न किसी ऐसे रहनुमा को जरूर खोज लाएगा जो उसे उसके मुकाम तक पहुंचा सके.

आज भारत बदलाव के दौर में है. नई पीढ़ी के मन में इसे लेकर ख्वाब है. वो अपने देश को दुनिया की अगली पंक्ति में देखना चाहते है. पर इस ख्वाब को पूरा करने से पहले उन्हें कई लड़ियाँ लड़नी होगी. कई चुभते सवालों का सामना करना होगा. इनमे कई सवालों के जवाब आज खोजना मुश्किल है. आने वाला वक्त ही इन सवालों का सही जवाब दे पायेगा.


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मै खुश हूँ कि आप जैसे शुभ चिन्तक देश की दिशा और दशा पर ध्यान रखे हुए है . लेख पढ़ कर बहुत ख़ुशी हुई , धन्यवाद . आगे के लिए शुभकामनायें ....

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