शांति और सियासत

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reliefcamp.jpgआज के पीढ़ी को वक्त की कमी है. सुबह से शाम तक की आपाधापी में उनसे बहुत सारी चीजें छूट जाती है. अपने आस पड़ोस में क्या हो रहा है इसकी जानकारी भी उन्हें बहुत बाद में ही मिल पाती है. फिर देश के बारे में सोचना ही क्या. खबर मिली तो ठीक वर्ना काम तो चल ही रहा है. कुछ इसी तरह के ख्यालात असम में हुई हिंसा के बारे में है. वहां के हालात और स्थिति पर गंभीरता न तो सरकार दिखा रही है न ही मीडिया. इसलिए आम जनता का तो कहना ही क्या.
देश का एक हिस्सा क्यों जल रहा इस पर हर राजनितिक दल की अलग अलग राय है. चिरपरिचित अंदाज़ में वोट बैंक की राजनीति की जा रही है. सभी प्रश्नों के उत्तर बड़े शांत और सुलझे तरीके से पर जो पार्टी लाइन के अन्दर हो दिए जा रहे है. लोगों की जिंदगियाँ जा रही है और रिलीफ कैम्पों में नई जिंदगियाँ आ रही है. पर सियासत इन सबसे बेखबर अपने ही अंदाज़ में चला जा रहा है.

सियासत के चलने का अपना एक अंदाज़ होता है. पर मीडिया, जिसे आम तौर पर निष्पक्ष माना जाता है, ने इस खबर को इतनी बेरुखी से दिखाया है मानो असम भारत का हिस्सा ही नहीं हो या फिर मारे जाने वाले लोग भेड़ बकरियां थे.

जिस तरह से असम जाने में चंद नेताओं को छोड़कर बाकियों ने  ने कोताही की बरती है क्या उसी का अनुसरण करते हुए ज्यादातर नेशनल मीडिया भी वहां जाने और जनता तक खबर पहुंचाने की अपनी भूमिका को भूल गया. अब गलती ज्यादा नेताओं की या मीडिया की कहना मुश्किल है.

लोकतंत्र में सबकी अपनी अपनी भूमिका है जिसे सही ढंग से निभाने की पुरजोर कोशिश करनी चाहिए. अगर कभी कहीं से चूक दिखता है तो जनता को इन्हें सही रास्ता दिखाना ही होगा. नई पीढ़ी को अपने आप धापी भरे जीवन से कुछ समय निकालना ही होगा ताकि उनका ये देश बाजारवाद का चादर ओढ़े एक असफल लोकतंत्र नहीं बल्कि पूरी दुनिया को भाईचारे सा संदेश देने वाला विश्व गुरु कहलाये.

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आज स्थिति बड़ी ही दयनीय हो गयी है. भगवान ही बचाए...

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