जश्न-ए-आजादी

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India_Flag.gifजश्न-ए-आजादी हर साल की तरह इस साल भी मनाया गया. न कोई परिवर्तन न कोई उत्साह, बस रस्म अदाएगी पर जोर. इस दिन निभाए जाने वाले रस्मों और कस्मों पर हर साल की तरह सारे भारतीयों की निगाह थी. पर वही वातावरण, वही वादे, वही लालकिले का प्राचीर. शायद अब लालकिला भी यहाँ से हुए वादों की लिस्ट को भूल गया होगा और अगले साल नए वादों की लिस्ट सुनने के लिए खुद को तैयार कर रहा होगा. क्या भारत आने वाले कई सालों तक इसी तरह से आज़ादी का जश्न मनाता रहेगा?


आज़ादी मिलने के से लेकर आज देश काफी आगे आ चुका है. पीढियां बदल चुकी है, प्राथमिकताएं बदल चुकी है, लिबास बदल चुके है, या यूँ कहे लोगों की पूरी की पूरी सोच बदल चुकी है. ऐसे में सिर्फ कस्मों वादों से काम चल पायेगा क्या? आजादी के वक्त लोगों की जरूरत रोटी, कपडा, मकान और शांति थी. साथ ही साथ अंग्रेजों के लिए मन में बुरा भाव भी था. इसलिए आजादी के तुरंत बाद अंग्रेजों के बदले किसी अपने के मुँह से इन वादों को सुनना बड़ा ही सुकून देता था.

आज भी अधिकाँश भारतवासियों की जरूरत बिलकुल है. रोटी, कपडा, मकान और  शान्ति. पर वादे आज सुकून नहीं देते. ६५ सालों में भी हम वहीं के वहीं  है सोच कर बड़ा अफ़सोस होता है. जब भारत के राजनेता अपने आखिरी व्यक्ति की मूलभूत जरूरत पूरी नहीं कर सकते तो बिजली पानी और सड़क के बारे में तो कहना ही क्या.

भारत चाँद पर यान भेज चुका, मंगल पर भेजेगा जान कर बेहद ख़ुशी होती है. पर ये ख़ुशी दुगनी तब हो जाती जब ये पता चलता की कोई भी भारतवासी अब भूखा नहीं सो रहा है. सबके अपने घर है. और सुकून से लोग इसके अंदर रहते है. अमीरों और गरीबो के बीच का फासला कम हो रहा है. सब एक दुसरे की इज्ज़त कर रहे है.

क्या 65 सालों में ऐसा नहीं होना चाहिए था? क्या इतने साल नाकाफी है विकास जन जन तक पहुचने के लिए? क्या इसमें 65 साल और लगेंगे? या ये सपना कभी पूरा ही नहीं होगा.

लाल किले से हर साल तर्क दिए जाते रहेंगे. अपने सरकारों का पक्ष रखा जाता रहेगा. समस्याओं पर रौशनी डाली जाती रहेगी पर निदान नहीं के बराबर होगा. इन कस्मों वादों को राजनीतिज्ञ और मीडिया अपने अपने अंदाज़ में परिभाषित करते रहेंगे. पर आम जनता अब इन वादों पर ध्यान नहीं देती उन्हें तो किसी निभाने वाले का इंतज़ार आज 65 साल बाद भी है और न जाने कितने साल और करना पड़ेगा.

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हम आज भी आसमा की तरफ देखते है ,और उसे छूने की कोशिश भी करते है ...लेकिन इस कोशिश में शायद अपने पैरो तले की जमीं को ही भूल गए .... लेख के लिए धन्यवाद , मै आशा करता हूँ हमारे नीति निर्देशक ये लेख पढेंगे.

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