arvind-kejriwal2.jpg
जनता के नब्ज को पकड़ पाने का इल्म शायद अभी भी हमारे देश में मीडिया और बुद्धिजीवियों के बस की बात नहीं है। लोकसभा के चुनावों में अपार सफलता पाने वाली भाजपा दिल्ली के चुनावों में अपना वजूद बचाने का संघर्ष करती दिखी। न तो लोकसभा चुनावों में न ही इस विधानसभा चुनाव में कोई जनता के मूड को सही-सही टटोल सका। केजरीवाल की सफलता ने साबित कर दिया कि कोई भी पाटभर्् जनता को हल्के में नहीं ले सकती। जनता का प्यार कब किसे मिल जायेगा ये शायद जीतने वाली पार्टियां भी सही-सही नहीं बता सकती है।
devendraf.jpgहरियाणा और महाराष्ट्र में आये ताजा परिणामों से एक बात तो साफ़ हो ही जाती है कि भाजपा का का ग्राफ अभी ऊपर की ओर जा रहा है। दोनों राज्यों में भाजपा का आधार काफी कम था। खासकर हरियाणा में तो भाजपा को कभी भी गंभीरता से नहीं लिया गया था। पर इन नतीजों ने एक बार फिर से देश के विश्लेषकों में पेशानी पर बल डाल दिया है। कई इसे मोदी की जीत बता रहें हैं तो कइयों को यहाँ मोदी लहर का खत्म दिख रहा है। स्पष्ट है मीडिया और विश्लेषक इस समय दो विभिन्न प्रकार की भाषाएँ बोल रहे हैं। भाजपा विरोधी और भाजपा समर्थक शायद मीडिया भी दो भागों में बंट गया है। ये विभाजन लोकतंत्र कर लिहाज़ से कोई सार्थक छवि पेश नहीं कर रहा है पर शायद देश को मीडिया का ये चेहरा कुछ और समय के लिए देखने को मिल सकता है।
all-party1.jpgराजनीति में संभावना तो हमेशा से देखी जाती रही है पर संभावनाओं पर राजनीति भी महाराष्ट्र में जबर्दस्त ढंग से खेली गई। राज्य की तमाम पार्टियों ने एक मायने में अकेले चलने का फैसला कर लिया है। ऐसा नहीं है कि ये पार्टियां गठबंधन को बनाये रखने की कोशिश कर रही थी बल्कि हर पार्टी कहीं न कहीं गठबंधन को तोड़ने के लिए ही काम कर रही थीं। भाजपा-शिवसेना की विचारधारा पर आधारित दोस्ती हो या कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस का सत्ता बांटने वाली मित्रता सभी संभावनाओं के कारण ही बनी थी। अब जब इस बार गठबंधनों के टूट का मौसम है तब भी संभावनायें तलाशी जा रही है। चारो पार्टियों को यूं तो लगता है कि वक्त उनका है पर क्या ये होे पायेगा इसकी भी चिंता जरूर है।
lalu-nitish-new1.jpgकहते हैं कि डूबते को तिनके का सहारा। इस कहावत को अगर आज के राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो लालू और नीतीश पर बिल्कुल खरा उतरता है। यहां दोनों एक साथ डूब रहे थे और उन्हें अचानक एक साथ तिनका के रूप में एक-दूसरे का साथ मिल गया। फिलहाल उपचुनाव में उनकी जीत एक छोटे से तालाब से उनके सफलतापूर्वक निकलने जैसा है। मगर विधानसभा चुनाव जो कि एक विशाल नदी की तरह होगी उसमें घुसकर निकलना अभी बाकी है। पर इतना जरूर है कि ये परिणाम लोकसभा चुनावों के बाद से मुश्किलों में चल रहे लालू और नीतीश के मुंह पर एक मुस्कान जरूर बिखेर दी है।

laloo_nitish.jpgदुश्मन का कोई भी दूसरा दुश्मन हमेशा अपना अच्छा दोस्त होता है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आजकल इसी जुमले को अमलीजामा पहनाने में लगे हैं। भाजपा के रूप में हालिया बने दुश्मन से लड़ने के लिए उनकी पार्टी ने अपने कुछ सबसे पुराने राजनीतिक दुश्मनों में शुमार राजद और कांग्रेस से गठजोड़ किया हे। इस गठबंधन की नैतिकता और उपयोगिता पर ढेर सारा चर्चा होता रहेगा मगर नीतीश कुमार की राजनीतिक दुश्मनी किस कदर अचानक पलटी मार ली इस पर भी बहस होगा। सत्रह सालों के गठबंधन के बाद भाजपा और जदयू दोनों एक दूसरे के लिए इतने अछूत हो गये हैं कि नीतीश ने पार्टी में चल रही गुटबाजी और बगावत को भी नजरअंदाज कर दिया है।
amit-shah.jpgजीत हमेशा से सुखद हुआ करती है। और अगर वो जीत कड़ी मेहनत के बाद सामने आई हो कहना ही क्या, सुख की मात्रा कई गुना बढ़ जाती है। लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी की जीत इसी श्रेणी में आती है। कई नेताओ की कड़ी मेहनत के बाद भारतीय जनता पार्टी को वो मुकाम मिल गया जिसकी शायद किसी ने कल्पना भी न की हो। प्रधानमंत्री और बाकी मंत्रियों को उनके मेहनत का इनाम तो पहले ही मिल चूका था, पर वो व्यक्ति जिसने भारतीय जनता पार्टी को एक प्रदेश में सबसे ज्यादा सीटें दिलवाई उसे भी सम्मानित करना था। अमित शाह को वो सम्मान मिल गया है। उन्हें भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष बना दिया गया है। सेनापति के सम्मान से पार्टी पुरे सेना यानि पार्टी के कार्यकर्ताओं के मनोबल बढ़ने की उम्मीद कर रही होगी।
  
lalu-nitish-.jpgपहली पारी में एक सफल केन्द्रीय मंत्री का दायित्व निभाने के बाद नीतीश कुमार ने दूसरी पारी में मुख्यमंत्री मे रूप में अपने बेहतरीन फार्म में दिखे। इन दोनों पारियों में ऐसा कहीं से भी नहीं लगा कि नीतीश कोई गलती कर रहे हैं। जनता उनके गुण गा रही थी, सहयोगी उनके उठाये गये कदमों की प्रशंसा कर रहे थे, मीडिया भी उन्हें विकास के मोर्चे पर पूरे अंक दे रहा था और विपक्ष पूरी तरह से हताश, निराश और बिखरा हुआ था। लगभग 8 साल तक इसी स्थिति में चलने के बाद अचानक नीतीश कुमार अपने फैसलों से पार्टी के भीतर, मीडिया में और जनता के बीच हर जगह घिरने लगे हैं। जहां जनता ने लोकभा चुनाव में पार्टी को अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंचा दिया है वहीं उनके शान में कसीदे पढ़ने वाले उन्हीं के दल के विधायक बगावत का झंडा बुलंद कर रहे हैं।
badaun-rapecase.jpgसरकार बदलने और अच्छे दिन के के सपने देखने वाले लोगों को लगता है अभी इंतज़ार करना पड़ेगा। अपने निर्णयों में परिपक्वता दिखाने के बावजूद नई सरकार के सामने अभी कई मुसीबतें अभी बाकी हैं। इन मुसीबतों में कुछ सबसे बड़ी मुसीबतें बिजली और क़ानून व्यवस्था की हैं। जहाँ एक ओर राजधानी दिल्ली में जनता बिजली और पानी की समस्या से दो-चार हो रही है वहीँ दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश में अराजकता जैसा माहौल बन गया है। ऐसा लग रहा है कि वहां कोई भी सुरक्षित नहीं है। कुछ दिनों के भीतर ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के दो नेताओं की हत्या की जा चुकी है।
lalu_nitish.jpgराजनीति में अनिश्चितताएं भरपूर है ऐसा सभी मानते हैं। यहाँ कब किसकी किस्मत चमक जाये और कौन कब गुमनामियों के अँधेरे में खो जाए कहा नहीं जा सकता। वर्तमान परिस्थिति में इन दोनों संभावनाओं को सबसे बेहतर ढंग से देखा जा सकता है। नरेंद्र मोदी के भारी जनदेश प्राप्त करने के बाद से देश में कई बड़े नेता गुमनामी के अँधेरे में खो गए हैं वहीं बिहार में जीतन राम मांझी एक ऐसे नेता के रूप में सामने आये हैं जिन्हे चंद दिनों पहले तक देश तो दूर बिहार में भी जदयू  के नेता के तौर पर नहीं देखा जा रहा था। पर ये सिर्फ सम्भावना का खेल ही है कि जीतन राम मांझी न सिर्फ मुख्यमंत्री बन गए बल्कि उनके समर्थन में उनके धुर विरोधी दल राजद भी आ गया है।
narendra-modi-win.jpgजबरदस्त जनमत के साथ नरेंद्र मोदी ने भारत के राष्ट्रीय फलक पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। ऐसा नहीं है कि मोदी की ये सफलता कोई अप्रत्याशित है उनकी सभाओं में उमड़े भीड़, समाज के कई वर्गों में उनके काम और समर्पण की स्वीकार्यता और विपक्षी नेताओं के तीखे बयान अक्सर ये दर्शा जाते थे कि मोदी ही इस चुनाव के सबसे बड़े खिलाडी हैं। पर जिस तरह का प्रचंड बहुमत मोदी को मिला है वैसा शायद ही किसी ने कल्पना की हो। मोदी के कट्टर समर्थक भी भाजपा को 280 सीटों के ऊपर सोचने में एक विराम जरूर लेते थे। इस जीत ने मोदी को को प्रधानमन्त्री तो बनाया ही है देश की सड़-गल चुकी राजनीतिक समीकरणों को भी नए ढंग से लिखने का काम किया है।

Recent Comments

  • Shyam Singh: kaafi shandaar dhang se ghotalon ki paribhasha batai gayi hai. read more
  • Aam Admi : आम आदमी जिंदाबाद read more
  • saurabh : bahut achchha lekh hai read more
  • drishtisoftware: हमारे राजनितिक दल जिसे हम करता धरता मानते है. वो read more
  • Saurabh Raj: अगर इस देश में भ्रष्टाचार न रहे और घोटाले बंद read more
  • Saurabh Raj: हम आज भी आसमा की तरफ देखते है ,और उसे read more
  • saurabh.raj734: मै खुश हूँ कि आप जैसे शुभ चिन्तक देश की read more
  • anupamenews: आज स्थिति बड़ी ही दयनीय हो गयी है. भगवान ही read more

Recent Assets

  • arvind-kejriwal2.jpg
  • devendraf.jpg
  • all-party1.jpg
  • lalu-nitish-new1.jpg
  • lalu-nitish.jpg
  • laloo_nitish.jpg
  • amit-shah.jpg
  • lalu-nitish-.jpg
  • babubeta.jpg
  • badaun-rapecase.jpg

February 2015

Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat
1 2 3 4 5 6 7
8 9 10 11 12 13 14
15 16 17 18 19 20 21
22 23 24 25 26 27 28