खजाने की तलाश

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treasure_chest.jpgभारत को अजूबों का देश सदा से माना गया है. बाहर के रहने वालों ने इस देश को हमेशा अबूझ पहेली की तरह देखा है. सपेंरों, जादूगरों और साधुओं को एक कौतुहल की तरह देखा गया है और उसे भारत का तक़रीबन पहचान बना दिया गया है. सदियाँ बीत जाने के बाद आज भी यही भारत की पहचान है. इस पहचान को हम हमेशा मजबूत भी करते रहे हैं. आज भी खजाना, सोना और साधू के चक्कर में न सिर्फ सरकार है बल्कि विपक्ष और मीडिया भी अपना बेशकीमती समय जाया कर रहे हैं.
आखिर इस देश को हो क्या गया है. क्यों सभी खजाने की धुन में मगन हैं. मीडिया, जिसे आम जनता के सरोकार से मतलब होना चाहिए था, वो भी इस खजाने पर लम्बी-लम्बी बहस करने में लग गया था. शायद यही हमारा असली चेहरा है. इस चेहरे को हम नई सोच, नया जमाना आदि कहकर ढक नहीं सकते हैं. हमारी सोच और हमारा मिजाज़ सभी नई बातों के बावजूद वही अन्धविश्वासी और कुँए के मेंढक जैसा है.

पुरातत्व विभाग के ये कहने के बावजूद कि इतना मात्रा में सोना मिलने की सम्भावना न के बराबर है लोगों की इसमें रूचि बनी हुई है. लोग इसके पल-पल की जानकारी चाहते है. अपने स्वाभाव के मुताबिक उनका ऐसा सोचना गलत भी नहीं है. जिस देश में अन्धविश्वास के नाम पर लोगों की बलि चढ़ा दी जाती हो वहां एक संत के कहने पर खजाने की आस करना कौन सा अपराध है.

ये मालूम नहीं कि खजाना निकलेगा या नहीं, ये भी नहीं मालूम की खजाना है या नहीं, पर खुदाई जारी है. एक दीवार मिली है और कई ऐतिहासिक चीजे मिलने की सम्भावना है. पर आम लोगों की रूचि इन ऐतिहासिक विरासतों पर बिलकुल नहीं है वो खजाना देखना चाहते वो संत की बात को सच होते देखना चाहते हैं.

अब देखना ये है कि ये खुदाई कब तक चलेगी. सोने की तलाश कब पूरो होगी. दुनिया के कई देशों में सोने के प्रति मोह है, पर जो मोह भारत में है वो बाकी सबसे काफी अलग है. और फिर अगर बात 1000 टन की हो तो कहना ही क्या. सरकार भी जीभ लपलापये कतार में खड़ी दिख जायेगी. वाह रे देश तुम कब बदलोगे......

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