बोर्ड भी फिक्स!

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srinivasan.jpgक्रिकेट अनिश्चितताओं का खेल है और भारत अनिश्चितताओं का देश है। शायद इसलिए ही क्रिकेट भारत में सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। इस लोकप्रियता का आलम यह है कि कई प्रशासनिक गड़बड़ियों के बावजूद दर्शकों का मैदान में आकर खिलाड़ियों का हौसला-अफजाई करना लगातार जारी है। स्पॉट और मैच-फिक्सिंग जैसे गंभीर आरोप भी लोगों को इस खेल से दूर नहीं कर सके। शायद इसी बात का फायदा उठाकर क्रिकेट के प्रशासन से जुड़े लोगों ने भी बोर्ड के अन्दर चीजें फिक्स कर ली हैं। आईपीएल पर लगे स्पॉट फिक्सिंग और बेटिंग के दाग और मीडिया के भारी शोर शराबे के बाद भी बोर्ड ने कोई खास कदम नहीं उठाया है। अध्यक्ष श्रीनिवासन पर चैतरफा हमले के बावजूद न तो उन्होंने इस्तीफा दिया न ही उनके साख में कोई कमी आई। उनकी सारी शर्तें मान ली गई है और बोर्ड प्रशासन में चल रहा फिक्सिंग पूरी तरह से बेपर्दा हो गया।
भारत का क्रिकेट बोर्ड अब एक ऐसा संस्था बन गया जिसे चंद राजनेता अपने इशारे से चला रहे हैं। इसमें एक ऐसा मकड़जाल बन गया है जिसमें सभी दल के लोग शामिल हैं। कई राज्य एसोसिएशन पर भ्रष्टाचार के मुकदमें चल रहे हैं। पूर्व अध्यक्ष पर भी भ्रष्टाचार और अनियमितता के गंभीर आरोप लगे हैं। जगमोहन डालमिया, जिन्हें संविधान से इतर अंतरिक अध्यक्ष बनाने की बात चली है, पर भी एफआईआर दर्ज है। उन पर 1996 के विश्वकप में पैसे के बंटवारे पर अनियमितता के आरोप हैं।

अब ये आरोप सच है या आपसी रंजिश से प्रेरित ये जनना मुश्किल नहीं है। भारत में हर आने वाली सरकार के साथ और हर तबादले के बाद अफसर के साथ ऐसा सलुक आम है। पर एक व्यक्ति जिस पर भ्रष्टाचार का अरोप हो उसे अंतरिम अध्यक्ष बनाकर अन्य देशों को क्या संदेश दिया जा रहा है ये सिर्फ बोर्ड के सदस्य ही बता सकते हैं।

अन्य देश का उदाहरण भी हमारे सामने है। इंग्लैंड में स्पॉट फिक्सिंग में पकड़ में आये तीनों पाकिस्तानी क्रिकेटर पर मुकदमा चला और उन्हें सजा हुई। जबकि हमारे देश में फिक्सिंग के आरोप में फंसे क्रिकेटरों को घेरा नहीं जा सका। जितने भी क्रिकेटरों का नाम 1999 में सामने आया था सभी सुबूतों के अभाव में छूट गये।

बोर्ड के सदस्य इन मामलों पर लीपापोती करने में कभी पीछे नहीं रहे। तब से लेकर आजतक के सभी बोर्ड सदस्यों का व्यवहार इन मामलों से एक-सा रहा है। इस बार बोर्ड अध्यक्ष के दामाद का नाम आने के बावजूद दिख रहा ढुलमुल रवैया कई अनकहीं बातें बता जाता है। चेन्नई सुपर किंग्स टीम के खिलाड़ियों का मैनेजमेंट भी विवाद के घेरे में है। स्पोर्ट्स मैनेजमेंट कंपनी में धोनी की हिस्सेदारी भी सवाल खड़े कर रही है। सभी खिलाडी चेन्नई टीम के हिस्सा है और धोनी कप्तान। इस कारण धोनी की चुप्पी को लेकर भी सवाल है। अब भ्रष्टाचार क्या होता है और हितों का टकराव क्या होता है ये समझना मुश्किल नहीं है।

अनिश्चितताओं का खेल यूं ही चलता रहेगा। प्रशंसक स्पॉट फिक्सिंग के साथ-साथ बोर्ड में हो रही फिक्सिंग भी देखते रहेंगे। समय गुजरता जायेगा। फिक्सिंग की यादें भी धुंधली होती जायेगी। सब कुछ फिर से पुराने ढर्रे पर लौट आयेगा। शायद यही एक ऐसा निश्चित आकलन बचा है जिसे हर अनिश्चितताओं के बावजूद हमारा देश जानता है।

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