पाकिस्तान में जम्हूरियत

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Nawaz-Sharif.jpgपाकिस्तान अपने वजूद की लड़ाई लड़ते-लड़ते उस दौर में पहुँच गया है जहाँ उसकी राह आसान नहीं है. पहली बार उसके इतिहास में कोई जनता के द्वारा चुनी गयी सरकार को जनता के द्वारा चुनी हुई सरकार ही सत्ता सौंपेगी. पाकिस्तान के आवाम ने वो कर दिखाया है जो कि पहले के लोग नहीं कर पाये. लगातार हिंसा से जूझ रहा पाकिस्तान के लिए ये चुनाव रेगिस्तान में दूर से दिखने वाले नखलिस्तान के जैसा है. पकिस्तान की जनता ने चैन-सुकून की जिन्दगी गुजारने के लिए बड़ी संख्या में मतदान में भाग लिया. पाकिस्तान जैसे देश में ये आसान नहीं था, पर उन्होंने कर दिखाया. नवाज़ शरीफ जीत के साथ पाकिस्तान के नए सरपरस्त के रूप में सामने आये हैं. उनके सामने बहुत बड़ी जिम्मेवारी भी है और चुनौतियाँ भी हैं.
हिंसा इन दिनों पाकिस्तान का दूसरा नाम हो गया है. आतंकवाद को बढ़ावा देने के क्रम में पाकिस्तान में एक ऐसा जमात उभरा है जिस पर न तो चुनी हुई सरकार का जोर है न ही वो फ़ौज से खौफ खाता है. दहशतगर्दो के हमले पाकिस्तान के हर शहर में हो रहे हैं यहाँ तक कि फौजी अड्डे पर भी हुए हैं. इन लोगों से निपटना और इन्हें मुख्यधारा में लाना नवाज शरीफ की सबसे बड़ी चुनौती है. ऐसे तत्वों के कारण पाकिस्तान एक नाकाम मुल्क के रूप में जाना जाने लगा है. ऐसे धब्बे से छुटकारा उनका मकसद होगा.

अफ़ग़ानिस्तान से जुड़ा हुआ सरहद भी नवाज़ की माथापच्ची में शामिल रहेगा. खुला हुआ सरहद पाकिस्तान के लिए कई परेशानियाँ खड़ी करता आया है. अमेरिका के अफ़ग़ानिस्तान से हटने के बाद इस सरहद की हिफाज़त एक मुख्य चुनौती है. अमेरिकी ड्रोन हमले अभी भी जारी हैं. ऐसे में अपने अवाम और अमेरिका दोनों को खुश रहने की दोहरी जिम्मेवारी नवाज़ के ऊपर है.

आर्थिक तौर पर पाकिस्तान के हालत बदतर है. भ्रष्टाचार सर चढ़ कर बोल रहा है. आसिफ अली जरदारी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं. ऐसा शायद ही कोई महकमा होगा जहाँ भ्रष्टाचार ने अपने कदम न रख दिए हों. इनसे निपटने में नवाज़ शरीफ कितने सफल होते हैं ये समय बताएगा.

इन चुनावों में सबसे अच्छी बात हुई है फ़ौज द्वारा कोई दखल नहीं दिया जाना. फ़ौज पहली बार इतनी जिम्मेवारी के साथ पेश आई है. पाकिस्तान के साथ कुछ सालों पहले तक ऐसा सोचना लगभग असंभव था. अदालतें अपनी जिम्मेवारी निभा रही रही है. परवेज़ मुशर्रफ के गिरफ़्तारी और उससे पहले युसूफ रजा गिलानी के मामले में अदालत ने अवाम का भरोसा जीता है. इस जम्हूरियत की जीत में मीडिया का भी बड़ा हाथ है. वहां का मीडिया निष्पक्ष होकर अपनी भूमिका बखूबी निभा रहा है. अपनी मजबूती के कारण मीडिया वहां सचमुच लोकतंत्र का चौथा खम्भा कहलाने का पात्र है.

नवाज़ शरीफ को कुछ ख़राब हालत मिले है तो कुछ अच्छी इदारे भी मिली है. उन्हें मिली हुई अच्छी और ख़राब चीजों से एक अच्छा माहौल बनाना है. अगर अच्छा माहौल बनता है तो न सिर्फ पाकिस्तान के लिए बल्कि हिंदुस्तान के लिए भी सुकून की बात होगी.

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