सिनेमा के सौ साल

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100-years-of-Indian-cinema.jpgपिछले सौ सालों में भारत के इतिहास अगर देखा जाए तो ये मानने में जरा सा भी देर नहीं लगेगा कि सब कुछ बदल चुका है. हवाएं बदल चुकी हैं, फिजायें बदल चुकी हैं यहाँ तक कि हम माने या न माने पर यहाँ रहने वाले इंसान तक बदल चुके हैं. पर एक चीज़ जो अब नहीं बदल पायी है वो है सिनेमा. ये आज भी उसी शिद्दत के साथ देखी और सराही जाती है. शायद ये बदलेगी भी नहीं. सिनेमा के प्रति भारतीयों के प्यार ने ही इसमें काम करने वालों को भगवान तक का दर्जा दे दिया है. सच कहा गया है कि सिनेमा सपने बेचने का माध्यम है. सपनों के इस संसार को सभी निर्माता-निर्देशक ने जमकर बेचा है. उन्होंने लगातार कई पीढ़ियों का मनोरंजन किया है उन्हें सुख-दुःख के भंवर में डूबने-उतरने का मौका दिया है.
हमारे सिनेमा को ऐसा नहीं है की आलोचनाएं झेलनी नहीं पड़ती. घटती कहानियों और महंगे तकनीक का इस्तेमाल न कर पाना आलोचना का मुख्य बिंदु है. विदेशों में इन कारणों से भारत में बनी फ़िल्में आज भी उतनी गंभीरता से नहीं ली जाती. कई भारतीय आलोचक भी यहाँ बनी फिल्मों को अब तक मसाला फिल्म ही कहते हैं. हर शुक्रवार ये मसाला फिल्म आयीं हैं और कभी दिलीप कुमार तो कभी अमिताभ बच्चन को सितारा बना दी हैं. पर इन मसाला फिल्मों के अलावा भी भारतीय सिनेमा की झोली में बहुत कुछ है. अर्थ, दामुल और प्रतिघात जैसे सिनेमा बनाने वाले फिल्मकारों ने भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है. इन जैसे सिनेमा के बनने से भारतीय सिनेमा रुपी फुलवारी में और भी कई रंग के फूल दिखने लगे हैं.

गानों का हमारे सिनेमा में विशेष महत्व है. दुनिया के दुसरे देशों में गानों की ऐसी परंपरा देखने को नहीं मिलती है. हमारी फिल्म इंडस्ट्री ने आज़ादी के पहले से लेकर अब तक कई बेमिसाल गायक-गायिकाओं को दुनिया के सामने पेश किया है. इनमे लता मंगेशकर, किशोरे कुमार और मोहम्मद रफ़ी जैसे गायक लोकप्रियता के लिए पीढ़ियों के मोहताज नहीं रहे. उनके गाये गीत आज भी ठीक उसी चाव से सुने जाते है जैसे वो नए में सुने जाते थे.

100yrsofcinema-newmain.jpgजैसे गानों ने फिल्म के चलने या न चलने में बड़ी भूमिका अदा की है वैसे ही अदाकार अपनी अदाकारी के जलवों से फिल्म को हिट कराते रहे है. बात चाहे सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की हो या आज के दौर के खान सितारों की. नायिकाएं भी कम नहीं रही हैं रेखा हो या माधुरी इनकी अदाओं पर पीढ़ी दर पीढ़ी कुर्बान होते रहे हैं.

सिनेमा ने अच्छा दौर देखा है तो खराब दौर भी झेला है. टीवी और विडियो के आने के बाद से जब दर्शक सिनेमा हॉल से दूर हो रहे थे तब कई लोगों ने इसे सिनेमा का पतन बताया था. मगर मल्टीप्लेक्स के आने के बाद सिनेमा एक बार फिर दर्शकों को लुभाने लगा है. पर ऐसा नहीं है कि सभी इस मल्टीप्लेक्स का दौर आने से खुश हैं. बेवजह के अन्तरंग दृश्यों और नग्नता की बाढ़ भी इसी मल्टीप्लेक्स संस्कृति ने ही फैलाई है.

आने वाले दिनों में कई चुनौतियाँ भी मुंह बाए इंतज़ार कर रही हैं. कैसे विश्व में स्वीकार्यता बढ़े इसकी कोशिश की जानी चाहिए. स्थानीय स्तर पर अधिक से अधिक दर्शकों तक कैसे पहुंचा जाए इसकी भी चुनौती है. भारत के कुल आबादी के 50 प्रतिशत से ज्यादा लोग अभी भी सिनेमा देख नहीं पाते. छोटे और कस्बाई शहरों में भी अच्छे सुविधा वाले सिनेमा हॉल की जरूरत है.

कई भाषाई सिनेमा अब तक अपने संघर्ष के दौर में है. तमिल और तेलगु सिनेमा जहाँ नई ऊंचाई छू रहे है वहीँ भोजपुरी और अवधी जैसे सिनेमा को आज भी अच्छे दर्शक और मल्टीप्लेक्स का इंतज़ार है. इन चुनौतियों से उबार कर ही भारत का सिनेमा हॉलीवुड और दुसरे इंडस्ट्री से टक्कर ले पायेगा.

अच्छी कहानी और तकनीक के बदौलत ही भारत अगले सौ सालों तक के सफ़र तय कर पायेगा. उम्मीद है वो सफ़र इस सफ़र से भी ज्यादा रोमांचक होगा. भारत वैश्विक सिनेमा के सिरमौर बनने के रास्ते पर है आइये हम सब मिलकर इस रास्ते को खूबसूरत बनायें.

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