निर्णय में व्यावहारिकता!

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fdi.jpgसरकार के हालिया निर्णयों से यूँ लग रहा है कि वो वैसे आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए कृतसंकल्प है जो विश्व बिरादरी उससे चाहती है. इन सुधारों को लेकर हमारे देश में आम नज़रिया नहीं बन बन पाया है. पक्ष और विपक्ष में बने नज़रिया ने देश को दो भागों में बाँट दिया है. विरोधी नज़रिया के कारण ही सरकार इन सुधारों को लागू करने में सालों हिचकती रही. विपक्षी पार्टियों के साथ-साथ सहयोगी दल और व्यापारी वर्ग भी रिटेल में एफ डी आई के विरोधी है. तो क्या सरकार ने गलत किया? देश को इन सबसे नुकसान होगा? इन सवालों का जवाब दोनों में से किसी पक्ष को पता नहीं. सभी अपने-अपने तर्क रखकर अपना नज़रिया सही साबित करने कि कोशिश कर रहे है.
हमारा देश बहुलतावादी है. यहाँ विभिन्न आर्हिक स्तर देखने को मिलते है. आय में इतनी ज्यादा असमानता शायद ही किसी देश में देखने को मिले. इसलिए विदेशों में आजमाए जा चुके फार्मूले हमारे देश में भी सफल हों इसकी कोई गारंटी नहीं है. रिटेल में एफ डी आई के आ जाने से विदेशी और बड़े ब्रांड के दुकान देश के बड़े-बड़े शहरों में खुल जायेंगी. पर क्या इन बड़े ब्रांड के दुकानों में आम भारतीय जा पायेगा? शायद नहीं. भारत में पहले से ही कुछ बड़े नाम बड़ी-बड़ी दुकानें चला रहे है. इनमे ऊँच मध्यम वर्ग और ऊँच वर्ग तो जाता है. पर क्या को भी अध्यन इस बात का खुलासा करता है कि इसमें कितने निम्न माद्यम वर्ग या निम्न वर्ग के लोग जाते है. शायद अभी भी वो इन दुकानों में नहीं जाते वो छोटे और मंझोले दुकानों में जाते है जहाँ वो अपने आप को ज्यादा सहज महसूस करते है. इन खरीददारों के कारण ही छोटे, मंझोले, रेहड़ी वालों, पटरी वालों के घर चल रहे है, पेट पल रहा है.

पर क्या देश रुकेगा? सालों से जो व्यवस्था चल रही है उसे आने वाले कल की बेहतरी के लिए बदलने की जरूरत नहीं है? अगर बदलने की बात ज्यादा असहज करती हो तो आजमाने में कोई हर्ज तो नहीं. आजमाइश से ही सही स्थिति का पता चल सकता है. वरना सदा के लिए लकीर के फकीर बने रह जाने की धब्बा हमारी आने वाली पीढ़ी हम पर लगाती रहेगी.

गाड़ियों के आने, पुल के बनने यहाँ तक की कंप्यूटर के आने पर भी लोगों के नज़रिया बंटे रहे. पर आजमाइश के बाद पता चला कि ये सारे तकनीक और सुविधायों ने लोगो का जीवन आसन ही किया है. धीरे-धीरे ये चीजें हमारी जिन्दगी में यूँ घुल-मिल गयी कि इनके बिना जीना लगभग असंभव सा हो गया है.

सो जरूरत है दोनों नज़रिया में हठ न दिकने की. और देशव्यापी एक ऐसे नज़रिया को बनाए की जिसे सभी स्वीकार करें. ऐसे किसी भी निर्णय को लेने से पहले गांव-गांव, शहर-शहर घूमने की और लोगों को निर्णय की बारीकियों को समझाने की. विपक्षी पार्टियों और छोटे व्यापारी वर्ग को विश्वास में लेने की.

हर बड़े निर्णय से पहले अगर इन पहलुओं पर ध्यान दिया गया तो कोई कारण नहीं कि देश में नज़रिए का फर्क हो. सरकार इन्ही मामलों में चुक दिकती नज़र आ रही. जनता तो दूर उनका विपक्षी दलों और सहयोगी पार्टियों से भी संवाद नज़र नहीं आ रहा. बड़े नेता जनता के बीच जाने से कन्नी काटते दिखते है. जनता के बीच जाकर रैलियां करना अपनी बातें कहना शायद बड़े नेता भूलते जा रहे है. प्रधानमंत्री भी इसी क्रम में आते है. सरकार के मुखिया होने के नाते पहली जिम्मेवारी जनता के बीच जाने की उन्ही की है.

कई सालों के अनिर्णय के बाद लिया गया निर्णय लिया तो गया, मगर पूरी तैयारी के बगैर. देश इसे स्वीकार करेगा या नहीं ये तो आने वाली वक्त की बात है मगर राजनितिक बिरादरी के बीच संवाद और नज़रिया के एक होने का इंतज़ार पूरे देश की देश की जनता को है. उम्मीद है सभी पार्टियां और सरकार जनता की नज़रिया को समझेंगी और अपना हर निर्णय में उन्हें भी भागीदार बनायेंगी.

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देश उबल रहा है. पर चिंता किसे है. सब अपनी धुन में मस्त है. आगे के दो साल काफी कठिन होंगे.

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