Modi_RF.jpgआज़ाद भारत ने अपने सफर का एक और साल पूरा कर लिया। तकनीकी दृष्टि से भारत 68 साल का एक नया मुल्क है। पर हकीकत में भारत की सभ्यता हज़ारों साल पुरानी है। अंग्रेज़ों से आज़ादी मिलने से पूर्व भी हमारा देश विदेशी शासकों के अधीन था। 15 अगस्त 1947 को मिली आज़ादी इस मायने में बहुत महत्वपूर्ण थी कि हमारा देश उन विदेशी हमलावरों के चंगुल से निकल कर हम देशवासियों के हाथ आ गया। भले ही हमारी जमीन के दो टुकड़े हो गए मगर दोनों हिस्सों में शासन यहाँ रहने वाले लोगों की ही रही। लोकतंत्र बहाल हुआ और जनता सर्वोच्च बन गयी। जनता अपने बीच से चुन कर प्रतिनिधि भेजती रही जो आज़ादी के अवसर पर देश को लाल किले के प्राचीर से सम्बोधित करता रहा। इसी परंपरा में इस बार बारी थी नरेंद्र मोदी की। लाल किले तक का उनका सफर जनता के समर्थन से ही संभव हो सका।
gopninath-munde.jpgप्रकृति का नियम कभी-कभी समझना काफी कठिन हो जाता है। जिनकी इस संसार में जिस समय सबसे ज्यादा जरूरत होती है वो उसी समय इस संसार को अलविदा कह देते हैं। हमारे देखते समझते हमें वो लोग छोड़ चले जाते हैं जिसकी कल्पना हमने अपने सबसे बुरे सपने में भी न की हो। गोपीनाथ मुंडे का अचानक सड़क हादसे में हुई मौत ने सबको झकझोर कर रख दिया है। अपने राजनीतिक जीवन के सर्वश्रेठ दौर के से गुजर रहे मुंडे शायद रहते तो निकट भविष्य में कई और बुलंदियों को देख सकते थे। पर होनी को शायद कुछ और ही मंजूर था।
exit-poll-2014.jpgचुनावों का आखिरी दौर समाप्त होने और उसके तुरन्त बाद एग्जिट पोल के दिखाए जाने के बाद गहमा-गहमी अपने चरम पर है। आने वाले दो दिन तक अब मीडिया और चौक-चौराहे इसी चर्चा में गुजारेंगे कि एनडीए को कितनी सीटें आयेंगी। सबसे ज्यादा ध्यान लोगों का भाजपा की सीटों को लेकर है। जितनी ज्यादा भाजपा की सीटें उतना बड़ा नरेन्द्र मोदी का कद। आम मतदाता से लेकर मीडिया और विपक्षी दल भी ये जानने को बेहद उत्सुक है कि नरेन्द्र मोदी का कद कितना बढने वाला है। पिछले एक दशक से लगातार विपक्षी पार्टियों, एनजीओ और एक मीडिया वर्ग का आलोचना झेल रहे नरेन्द्र मोदी का इस तरह से राष्ट्रीय परिदृश्य पर प्रभावी दस्तक का अनुमान लगभग सभी एग्जिट पोल लगा रहे हैं।
Cricket.jpgजिसकी लाठी उसकी भैंस कहावत को अगर कोई आज के दिन में सबसे अच्छी तरह से चरितार्थ कर रहा है तो वो है बीसीसीआई। आईसीसी में अपना वर्चस्व साबित करने का गाहे-बेगाहे मौके ढूंढ़ने वाले बीसीसीआई को अब मौका नहीं ढूँढना पड़ेगा। भले ही अपने इस प्रस्ताव में भारत ने ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड को भी जोड़ लिया है मगर पैसों कि स्थिति देखते हुए लगता नहीं कि इन दोनों की ज्यादा चलने वाली है। क्रिकेट में आने वाले पैसे को लेकर हमेशा से भारत की हेकड़ी चलती रही है और अब ढांचागत परिवर्तन के बाद इस हेकड़ी के और कई गुना बढ़ जाने की उम्मीद है।
sachin-bharat-ratna.jpgईश्वर के बनाये इस संसार में हर शुरू होने वाले का अंत होना तय है। फिर वो चाहे कोई वस्तु हो, घटना हो, या कोई मनुष्य ही क्यों न हो। सचिन तेंदुलकर के खेल के साथ भारतीय जनमानस का साथ लगभग ढाई दशकों का रहा। पर जैसा की होता आया है इस अच्छी चीज का भी अंत हो गया। अपने ढाई दशकों के सफ़र में सचिन भारतीय खेलप्रेमियों को हंसी, ख़ुशी, आनंद सभी कुछ दिया। वो रन बनाते चले गए और मैदान में मौजूद प्रशंसक सचिन..सचिन  के नारे लगाते चले गए। ये नारे लगाते-लगाते बच्चे, युवा और युवा, प्रौढ़ावस्था में पहुँच गए। ये नारा भारतीय क्रिकेट को हमेशा याद रहेगा। इसके नारे के प्रति हमारा प्रेम आगे भी कई उम्दा खेल से जुडी हस्तियों को सचिन जैसा बनने की प्रेरणा देता रहेगा।
sachin_last.jpgमुम्बई में सचिन ने अपनी आखिरी टेस्ट में पहली पारी खेल ली है। अगर सब कुछ सामान्य रहा तो इस बात की उम्मीद कम है कि सचिन दुबारा बल्लेबाजी के लिए मैदान में आयेंगे। अपने आज खेली गयी पारी में जनता और मीडिया के भारी दवाब के बावजूद वो एक बेहतरीन पारी खेलने में सफल रहे। अपने आखिरी मैच में कई महान खिलाडी अपेक्षाओं पर खरे उतर पाने में कामयाब नहीं रहे थे। इनमे सबसे बड़ा नाम सर डॉन ब्रैडमैन का है। पर सचिन ने अपने प्रसंशकों को अच्छे खेल का प्रदर्शन दिखाते हुए एक नायाब तोहफा दिया है। इसे उनके प्रसंशक लम्बे समय तक अपनी यादों में संजोये रहेंगे।
treasure_chest.jpgभारत को अजूबों का देश सदा से माना गया है. बाहर के रहने वालों ने इस देश को हमेशा अबूझ पहेली की तरह देखा है. सपेंरों, जादूगरों और साधुओं को एक कौतुहल की तरह देखा गया है और उसे भारत का तक़रीबन पहचान बना दिया गया है. सदियाँ बीत जाने के बाद आज भी यही भारत की पहचान है. इस पहचान को हम हमेशा मजबूत भी करते रहे हैं. आज भी खजाना, सोना और साधू के चक्कर में न सिर्फ सरकार है बल्कि विपक्ष और मीडिया भी अपना बेशकीमती समय जाया कर रहे हैं.
Sacchin T.jpgसचमुच ऐसा लग रहा है जैसे कुछ छुट रहा है, बिखर रहा है. सचमुच यकीन करना मुश्किल है कि कोई दिन ऐसा आएगा जिस दिन के बाद सचिन तेंदुलकर जैसा किवदंती मैदान में खेलता हुआ नहीं दिखेगा. पिछले ढाई दशकों में बिना सचिन के क्रिकेट के बारे में सोचना भी मुश्किल था. भारत जैसे देश में जहाँ खेलों के प्रति अभी भी रूचि उस स्तर पर नहीं पहुंची है वहां अपने खेलने के दौरान की भगवान का तमगा पा लेना सचिन की काबलियत को दर्शाता है. जिस देश में जहाँ राजनीति, भ्रष्टाचार, अपराध, अशिक्षा, गरीबी सभी चीजों को देखकर निराशा होती है वहीँ सचिन को देखकर एक गर्व की अनुभूति होती है कि एक चैंपियन हमारे पास भी है. उनके टेस्ट मैचों में सन्यास की खबर ने एक अजीब सा खालीपन भर दिया है.
pran.gifकुछ लोग कामयाबी के पीछे भागते है तो कुछ लोगों के पीछे कामयाबी भागती है. पहले वाले खांचे में बहुत सारे लोग मिल जायेंगे पर बाद वाले खांचे में बिरले ही समा पाते हैं. अपनी बड़ी शख्सियत और दमदार आवाज़ के कारण प्राण साहब हमेशा से बाद वाले में रहे. उन्होंने खल चरित्रों में भी इतनी कामयाबी देखी कि नायक भी उनसे इर्ष्या रखने लगे थे. पर सिर्फ खलनायक के रूप में नहीं परदे पर निभाए हर चरित्र में वो कामयाबी दास्तान लिखते गए. भारतीय फिल्म इतिहास की कुछ सबसे बड़ी और कामयाब फिल्मों में उन्होंने काम किया. नायक हो या खलनायक या फिर कोई चरित्र अभिनेता उनके बाद आये सभी कलाकारों ने उनसे कुछ न कुछ सीखा और अपने को बेहतर किया.
khan-jia.jpgप्रसिद्धि और चमक-दमक के पीछे एक स्याह दुनिया छिपी होती है. बॉलीवुड के सन्दर्भ में ये कथन बड़ा ही उपयुक्त बैठता है. पर इस स्याह दुनिया पर नज़र बहुत ही कम जाता है. जब कोई बड़ी घटना घट जाती है तब हम इस स्याह दुनिया पर नज़र डालते है. जिया खान का कम उम्र में ही आत्महत्या जैसा बड़ा कदम उठा लेना इस दुनिया की सच्चाइयों को सामने लाता है. एक लड़की जो कम उम्र में ही महानायक अमिताभ बच्चन के साथ करियर की शुरुआत करती है, जो मुंबई में सिर्फ इसलिए रहती है कि उसे फिल्मों में सफल होना है, जो समझौते नहीं करती है, जो फिल्मों को चुनने के मामले में बड़ी ही सख्त हो, उसका आचानक मौत कई सवाल उठा जाता है.

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