विवादस्पद पोस्टर

| No Comments | Google
poster.jpgपिछले साल दिसंबर में जनता ने दिल्ली में जो खंडित जनादेश दिया था वो आज भी उनका उनका पीछा कर रहा है। इसके विपरीत देश में पूरी की पूरी राजनीति बदल गयी। एक पार्टी को जनता ने पूर्ण बहुमत दिया जो कि सरकार चला रही है और शायद जनता को इस बात का इत्मीनान है कि अच्छा या बुरा चाहे जो भी हो कम से कम राजनीतिक अस्थिरता तो नहीं रहेगी। देश का ये मिजाज ऐसा लगता है कि दिल्ली को देखकर ही आया होगा। तीन पार्टियों के बीच पीस रही दिल्ली की जनता राजनीतिक अस्थिरता का एक ऐसा दौर देख रही है जो उनके लिए बेहद घातक है।
राजनितिक अस्थिरता का ये दौर जनता और तीनो बड़ी पार्टियों के लिए बेहद हताशा भरा रहा है। खास कर आम आदमी पार्टी जो कि लोकसभा चुनावों के बाद से एक तरह से अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। लोकसभा में अपने सभी बड़े चेहरे की हार के बाद पार्टी की एकमात्र उम्मीद दिल्ली ही है। ऐसे में पार्टी और उनके नेताओं के लड़ाई का केंद्र बिंदु बदल गया है। जिन विषयों पर वो कांग्रेस और भाजपा को कोसा करते थे आज उन्ही विषयों पर भाजपा और कांग्रेस द्वारा कोसे जा रहे हैं। जामिया नगर इलाके में ताजा लगे पोस्टरों के बाद से आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और भाजपा दोनों के निशाने पर है।

कांग्रेस के तीन अल्पसंख्यक विधायकों के भाजपा के समर्थन को लेकर लिखे गए इस भड़काऊ पोस्टर को भले ही आम आदमी पार्टी अपना नहीं मान रही हो पर उसके कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी ने कुछ सवाल तो जरूर खड़े कर दिए हैं। 'आप' प्रवक्ता दिलीप पांडे भी गिरफ्तार हुए है और उन पर इन पोस्टरों को लगाने और भावनाओं को भड़काने का इलज़ाम है। 'आप' हमलावर होकर जब पांडे के बचाव में सामने आई तब कांग्रेस और भाजपा भी सामने आयीं। दोनों पार्टियों ने 'आप' को जमकर कोसा और राजनीतिक विमर्श को गिराने का आरोप मढ़ा। भाजपा तो 'आप' की मान्यता रद्द करने की मांग भी कर दी।

पर ये सब हो क्यों रहा है ? क्यों इतनी बेचैनी सभी पार्टियों में है ? क्यों सबको ऐसा लग रहा है वो जीत नहीं पाएंगे ? कारण जनता का रवैया है।  सभी को लग रहा है वो अपनी जमीन खो रहे हैं। उसी जमीं को हासिल करने के चक्कर में सभी दाल उलटी-सीधी हरकत पर उतारू हैं। जोड़-तोड़ और ख़रीद-फरोख्त का इलज़ाम तो पहले से था ही अब सांप्रदायिक सद्भाव भी निशाने पर है।

जिस स्थिति में दिल्ली है वहां से अब इसका समाधान बस सिर्फ चुनाव नज़र आता है।  अगर जोड़-तोड़ से सरकार बन भी गयी तो न तो उसका इक़बाल रहेगा न ही स्थिरता।

उम्मीद है जल्द ही दिल्ली में चुनाव होंगे और इस निम्न दर्जे की राजनीति से उसे छुटकारा मिलेगा। सभी दिल्लीवासी बड़ी शिद्दत से आने वाले चुनावों का इंतज़ार कर रहे होंगे क्योंकि सबक सिखाने का उनके पास यही एक मौका होगा।

Leave a comment