सनातन धर्म और साईं

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swaroopanand-sai-baba.jpgविवादों का आगमन कब और कैसे होगा कोई नहीं जानता है। हमारे देश का आम आदमी, जो अपने बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में दिन रात लगा रहता है, विवादों से हमेशा दूर रहना चाहता है। राजनीतिक और अपराधिक विवादों की जिस देश में बहुतायत हो वहां ऐसा करना आम आदमी के लिए शायद उचित भी है। मगर इस बार विवाद थोड़ा हटकर है। विवाद धार्मिक है। विवाद साईं बावा से जुड़ा हुआ है। जो व्यक्ति अपने जीवन शायद किसी विवाद में न पड़ा हो उसे पहले तो देशवासियों ने मंदिर में पूजा के लिए रखकर भारी इज़्ज़त दी और अब इसी देश में उनके पूजा होने और भगवान होने पर बहस की जा रही है।
इस बहस की शुरुआत शंकराचार्य स्वरूपानंद ने की थी मगर इसमें भाग लेने वाले दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे है। अब इसमें उमा भारती का नाम भी जुड़ गया है। साईं के पक्ष में अपने बात रखने के कारण उमा शंकराचार्य के साथ-साथ बाकी संत समाज के निशाने पर आ गयी हैं। उनसे इस्तीफा तक माँगा जा रहा है। मीडिया को भी इस बहस में काफी दिलचस्पी ले रहा है। और आखिर ले भी क्यों नहीं साईं के दरबार में जहाँ एक ओर बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ, फ़िल्मी सितारे और खेल से जुडी हस्तियां आती रही हैं वहीँ दूसरी ओर मंदिर का चढ़ावा भी दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही  जा रहा है।

सनातन धर्म पुरे दुनिया में एकमात्र ऐसा धर्म है जिसे न तो किसी ने स्थापित किया है न ही इसके विचारों को किसी एक पुस्तक में समेटा गया है। अन्य धर्म जहाँ अपने लकीर पर चलते दिखाई देते है वहीँ सनातन धर्म हमेशा से ही सुधारवादी रहा है। कई पुराने परम्परा इसमें टूटे है और कई नए परम्पराओं को इसमें समेटा गया है। यहाँ तक की बौद्ध, जैन और सिखों को भी हिन्दुओं के साथ सनातन धर्म में सम्मिलित किया गया है। आज भी इसमें कई कुरीतियां हो सकती है पर उससे लड़ने का माद्दा भी इस धर्म के पास है। दुनिया में यही एकमात्र धर्म है जो तलवार के धर्म पर आगे नहीं बढ़ा है।

दुनिया के बाकी धर्म लोगों का धर्म परिवर्तन कर अपनी संख्या बढ़ाते रहे है मगर शायद सनातनियों ने इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया है। शायद शंकराचार्य को इसी बात का डर है। उन्हें डर है कि कहीं साईं भक्तों को अलग दर्जा देकर सनातन धर्म से जैन बौद्ध और सिखों की तरह अलग न कर दिया  जाए। पर इसमें सच्चाई कम ही दिखती है।

साईं के साथ हो रहे विरोध और अंतर्विरोध भी इसी का एक हिस्सा है। सनातन धर्म में कण-कण में भवन की कल्पना की गयी है। इसे ध्यान में रखते हुए  शायद ही इस धर्म में किसी को पूजने का विरोध किया जा सकता है। हमारे यहाँ उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम हर जगह देवता अलग है मगर भक्त एक ही हैं। जो भक्त तिरुपति बालाजी की पूजा करता है वही माँ वैष्णो देवी के दरवार में भी जाता है। यहाँ तक कि वही भक्त गुरद्वारे और जैन मंदिरों में भी हाजरी लगाता है। पर इससे सनातन परम्पाएं मजबूत ही हुई है कमजोर नहीं।

उम्मीद है ये विवाद जल्द थमेगा और हर आम आदमी एक दुसरे के आस्था से जुड़े प्रतीकों का सम्मान करेगा। यही सनातन धर्म का सार अब तक रहा है और आगे भी रहेगा।

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