रामदेव के बिगड़े बोल

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ramdev.jpgजहाँ देश चुनावों में अपना भविष्य खोज रहा है वहीं नेता अपनी बदजुबानी से आम लोगों के बीच एक नकारात्मक छवि बना रहे हैं। चुनावों को जीतने की बेचैनी ने एक ऐसा माहौल बना दिया है जहाँ मुद्दे बिलकुल गौण हो गए हैं और व्यक्तिगत टिप्पणियां हावी हो गयी हैं। ये हमले ऐसा नहीं है है कि कोई खास दल या खास नेता कर हों। ये बीमारी कमोबेश सभी दलों में और सभी नेताओं में सामान्य रूप से व्याप्त है। चाहे नरेंद्र मोदी पर उनके शादी को लेकर हुए हमले हों या फिर मनमोहन सिंह पर की जा रही टिप्पणियाँ, सभी आहात करने वाली हैं। राजनीति के स्तर को और भी नीचे गिराने वाली हैं। इन सभी के बयानों में एक और नाम जुड़ गया है बावा रामदेव का। रामदेव ने राहुल गांधी पर अभद्र टिप्पणी कर इस गिरावट का स्तर बढ़ाया ही है।
बावा रामदेव और विवादों का चोली दामन का साथ हैं। अपने दिल्ली में किये गए अनशन और उसके बाद की घटनाओं ने रामदेव को विवादों में ला खड़ा किया था। उस घटना के बाद से रामदेव और कांग्रेस में जैसे ठन सी गयी थी। कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने उन्हें ठग और न जाने क्या-क्या कहा। रामदेव भी पीछे नहीं हटे उन्होंने कांग्रेस को उसी के भाषा में जवाब देना शुरू कर दिया। पर अब ये लड़ाई लगता है मुद्दों की न होकर व्यक्तिगत जलन की हो गयी है। राहुल पर दलितों के घर जाकर हनीमून मनाने की बात कहकर रामदेव ने अपना कद खुद ही काफी काम कर लिया है।

भले ही अपने इस बात के लिए बाद में उन्होंने खेद प्रकट कर लिया, पर सवाल ज्यों का त्यों बना रह गया कि क्यों नेता और रामदेव जैसी हस्तियां इस तरह के बयान देती है और बात में मामले के तूल पकड़ने पर सफाई देते नज़र आते हैं।  बसपा और मायावती ने रामदेव के इस बयान पर गहरी आपत्ति दर्ज की है। उन्हें ये मुद्दा भाजपा को भी घेरने में मदद करने वाला लग रहा है। कांग्रेस और सपा भी हमलावर है। भाजपा को समझ में नहीं आ रहा है कि करें तो क्या करें। वो रामदेव के बयान का बचाव भी कर रही है और अपनी छवि पर आंच न आये इसकी भी कोशिश कर रही है।

रामदेव पर अब एफआईआर दर्ज हो चूका है और कानून अपना काम करेगा पर ऐसे बयान को जनता कब तक झेलती रहेगी ये कहना कठिन है। अभी चुनाव परिणाम आने में वक़्त बचा हुआ है इसलिए आने वाले दिनों में फिर कोई अजीबोगरीब बयान नहीं आएगा इस सम्भावना को ख़ारिज नहीं किया जा सकता। 

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