प्रशांत भूषण का कश्मीर राग

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pbhushan.jpgकहते हैं कि धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होये, माली सींचे सौ घड़ा ऋतु आये फल होये। पर ऐसा लगता है कि आम आदमी पार्टी बहुत जल्द बहुत कुछ पा लेना चाहती है। पार्टी के नेता ऐसे-ऐसे बयान दे रहे है मानो उन्हें बहुत कुछ कह लने की जल्दी हो। दुसरे पार्टियों को नैतिक सलाह देने वाली आम आदमी पार्टी इस बार प्रशांत भूषण के कश्मीर पर विवादित बयान के बाद बैकफूट पर है। पार्टी ने भूषण के बयान से अपनी दूरी बना ली है पर उनका बयान पार्टी को नुकसान जरूर पहुंचा सकता है। भूषण ऐसे बयान पहले भी देते आये हैं पर राजनीतिक पार्टी बनने के बाद वो अपने विरोधियों के साथ-साथ मीडिया के निशाने पर भी हैं।
लोकतंत्र और लोकतंत्र में आम जनों कि सहभगिता दोनों महत्वपूर्ण हैं। पर एक स्वस्थ लोकतंत्र को क्या भीड़तंत्र बनने दिया जा सकता है? क्या क़ानून का राज ख़त्म कर भीड़ का इन्साफ वाले फॉर्मूले पर चला जा सकता है? शायद नहीं। जनमत का अर्थ ये नहीं कि जेल के अंदर कैदियों से जनमत संग्रह करवा लें कि उन्हें अंदर रहना है या बाहर जाना है। संविधान और क़ानून के इतर किसी भी बात की कहने और करने इज़ाजत किसी को भी नहीं होना चाहिए। इस मामले में भारत के सभी राजनीतिक दल अपने हिसाब से चलते है पर सभी दलों में एक आम राय होनी चाहिए कि संवेदनशील मुद्दे को कम से कम मीडिया और अन्य दुसरे फोरमों पर उठाया जाए। और अगर उठाने की जरूरत भी पड़े तो उसे निजी राय के रूप में पेश न किया जाए।

इस मामले में पार्टी को सामने आकर सफाई देनी पड़ी है। अपने गठन के बाद से आम आदमी पार्टी ने सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया है। दुसरे संवेदनशील मामले में पार्टी की राय अभी खुलकर सामने नहीं आयी है। नक्सलवाद, माओवाद, जातिप्रथा, बंगलादेशियों का मुद्दा, नदियों के जल का बंटवारा, आरक्षण, सेकुलरिज्म और न जाने क्या-क्या। इन सभी मुद्दों पर पार्टी की राय अभी साफ़ नहीं है। जैसे-जैसे समय गुजरेगा इन मुद्दों पर पार्टी को अपनी बात कहनी होगी। एक राजनीतिक दल के रूप में इन मुद्दों पर राय रखना कोई आसान काम नहीं है। वोटों का गणित ऐसे ही मुद्दों पर राय बना कर तय किया जाता है।

आम आदमी पार्टी लोकसभा का चुनाव लड़ना चाहती है। वो पुरे भारत में एक गम्भीर चुनौती के रूप में उभरना चाहती है। उनकी राजनीति करने की शैली को देखकर इसे एक सकारात्मक कदम के रूप में लिए जाना चाहिए। मगर प्रशांत भूषण और उनके जैसे लोगों का बयान पार्टी का पक्ष को ढीला कर रहे हैं। आम आदमी पार्टी की कोशिश होनी चाहिए कि वो हर मुद्दे पर अपनी राय रखे मगर सोच विचार कर। पार्टी की अपनी एक लाइन होनी चाहिए जो उसके सभी नेता माने। इसके बिना पार्टी बिखरी हुई नज़र आएगी।

लोकसभा के चुनावों तक सभी मुद्दे साफ़ किये जाने की जरूरत है वरना आम आदमी पार्टी ऐसे ही उलझनों में उलझती चली जायेगी। उम्मीद है पार्टी अपना देशव्यापी दायरा बनाने के साथ-साथ देशव्यापी मुद्दों पर भी अपनी स्थिति साफ़ करेगी।

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