सरदार पर सियासत

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sardar-patel-statue-of-unity.jpgबेतुके बहस करना और उसमे देर तक उलझे रहना कोई भारतीयों से सीखे।स्वतंत्र भारत के पहले गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल के बारे में चल रहा ताजा बहस दोनों बड़े राष्ट्रीय पार्टियों से होते हुए अब मीडिया चैनलों में बैठे हुए बुद्धिजीवियों तक पहुँच गया है। लोग चर्चा इतिहास की करने लगे हैं। नेहरू और पटेल के बीच के रिश्तों को खंगाला जा रहा है, यहाँ तक कि बात सेकुलरिज्म तक पहुँच गयी है। नरेंद्र मोदी सरदार के सेकुलरिज्म के बारे में बता रहे हैं और दुसरे इस पर अपनी राय रख रहे हैं। इन सबके बीच सरदार किसके है इसकी चर्चा बड़े जोरों पर है चुनावों के अलावा अब कांग्रेस और भाजपा में विरासत को लेकर भी प्रतिस्पर्धा शुरू हो गयी है।
सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या सरदार जैसे इतिहास पुरुष को हम किसी दल या वर्ग की राजनीति में बाँट सकते है? क्या हम उन जैसे कालजयी व्यक्तित्व को किसी दल या वर्ग की संकीर्ण राजनीति में उलझने दे सकते है? उत्तर है शायद नहीं। हर उस व्यक्ति की सराहना होनी चाहिए जो देश के लिए मायने रखता हो। हर दल और वर्ग के लोगों को ऐसे लोगों का चरण वंदन करने का पूरा हक़ है। फिर वो चाहे नरेंद्र मोदी ही क्यों न हों।

स्टेचू ऑफ़ यूनिटी की कल्पना करके नरेंद्र मोदी ने देश को एक नया प्रतीक देने की कोशिश की है। ये सरदार पटेल के अलावा किसी और का भी हो सकता था। पर क्या तब भी इतना ही विवाद होता, शायद नहीं। यहाँ कांग्रेस के लोग सीधा-सीधा मोदी को अपने विरासत में सेंध मारते देख रहे हैं।

हमारे देश की पूरी कि पूरी राजनीति नामों, मूर्तियों और प्रतीकों के इर्द-गिर्द घूमती है। सुदूर दक्षिण से लेकर उत्तर प्रदेश तक मूर्ति बनाने और उसका श्रेय लेने की कोशिश बड़े पैमाने पर कि जाती है। मायावती ने तो अपने शासन काल में अपनी ही मूर्तियां लगवा दी थी।

इस निरर्थक विवाद पर जितना जल्द लगाम लगे उतना ही अच्छा। सरदार और सरदार सरीखे जितने भी नेता है उन्हें पूजने और आराधने का हक़ सभी भारतीयों का है और इसे न कोई छीन सकता है न ही कोई चुरा सकता है। सभी बड़े दल इन मुद्दों पर एक राय बनाये ताकि जनता को ऐसे कड़वे बहस न सुनना पड़े।

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