मुज़फ्फरनगर का दाग

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muzaffarnagar_riot.jpgउत्तर प्रदेश में पिछले एक सालों में माहौल ऐसा बन रहा है मानो पानी महंगा और सस्ता खून हो गया है.  लगातार हो रहे छोटे-मोटे सांप्रदायिक तनाव के बाद मुज़फ्फरनगर में जो कुछ हुआ और हो रहा है उसकी चिंता पुरे समाज को होनी चाहिए. राजनीति का ककहरा न जानने वाले भी इन हिंसक वारदात के पीछे चल रही राजनितिक मंशा को अच्छी तरह समझ रहे हैं. अपने गिरते जनाधार की फ़िक्र ने समाजवादी पार्टी को वहां पहुंचा दिया जहाँ से उसकी डगर आसान नहीं रहने वाली है. अल्पसंख्यक कार्ड का प्रदर्शन पहले भी होता रहा है पर ऐसा भोंडा प्रदर्शन की दूसरी मिसाल देखने को नहीं मिलती.
भाजपा ने भी अपने हिस्से की सियासत इस हिंसा में खोज निकाला है. अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक की राजनीति सपा के साथ-साथ भाजपा को भी काफी पसंद है. पर इस बार अंदाजे बयां दूसरा है. नरेन्द्र मोदी के भाजपा के सबसे बड़े नेता बनने के बाद से ही इस बाद के कयास लगाये जा रहे थे आने वाला आम चुनाव आज़ाद भारत के इतिहास का सबसे ज्यादा ध्रुवीकरण वाला चुनाव होगा. पर इस ध्रुवीकरण में निर्दोष और गरीब की जान जाए ये बड़ी विडंबना है. अपने-अपने सहूलियत के हिसाब से खून की राजनीति करना भारत के तमाम दलों को अच्छी तरह से आ गया है. इन दलों में में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी भी शामिल है.

केंद्र सरकार ने 11 राज्यों को एडवाइजरी जारी की है. इन राज्यों को बताया गया है कि वो सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिहाज़ से संवेदनशील हैं. अब सवाल ये उठता है कि केंद्र का काम सिर्फ एडवाइजरी भेजना है? क्या जवाबदेही का तंत्र जो लगातार फेल होता जा रहा है उसको विकसित करना केंद्र का काम नहीं है? शायद सियासत में अब जवाबदेही जैसे किसी शब्द की जरूरत ही नहीं रही.

देश पहले ही विभाजन और हिंसा की एक बड़ी त्रासदी झेल चूका है. पर न जाने क्यों हमारे नेताओं से अभी भी अंग्रेजी स्टाइल वाला बांटो और राज करो फार्मूला छुट नहीं रहा. कभी कभी तो ये बात सच लगती है कि गोरे अंग्रेजो से मुक्ति के बाद आज भी हम काले अंग्रेजो के गुलामी में जी रहे हैं. न जाने वो दिन कब आएगा जब कोई ऐसी सरकार आएगी जिसे लोग आदर्श कहेंगे. कहेंगे कि हिंदुस्तान पर शासन सही मायेने में कोई हिंदुस्तानी कर रहे हैं.

पर ये होगा नहीं. सच्ची आज़ादी हमें हासिल होगी नहीं. जी हाँ यही हमारा दुर्भाग्य है. मरने वाले हिन्दू होंगे, मुसलमान होंगे पर वो हिंदुस्तानी नहीं होंगे. राजनितिक पार्टियों से लेकर मीडिया सभी इस संवेदनशील मसले में कुछ मसाला चाहते हैं. मसाला मिलता है उनकी दुकानें चलती हैं.  

जब तक धर्म को राजनीति से अलग नहीं किया जाएगा ये होता रहेगा. लोग मरते रहेंगे, राजनितिक दल तमाशबीन बने रहेंगे. जरूरत है सभी धर्म गुरुओं और प्रबुद्ध नागरिकों को सामने आने की और बताने की अब बहुत हो चूका. वो अब सियासतदानो की कठपुतली नहीं बनेगें. वो किसी भी दल को सहयोग या वोट डालने को नहीं कहेंगे. अगर ये इतने इमानदार हो जाएँ तो निश्चित रूप से जो दुकान आज सज रही है वो बंद जायेगी.

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