सत्ता के लिए दंगा

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hatespeech.jpgसत्ता का नशा कुछ इस तरह सत्ताधारियों के नस में समा जाता है कि वो इसे बचाने के लिए किसी भी हद तक पहुँचने के लिए तैयार रहते हैं. इससे आम आदमी किस तरह मुसीबत झेल रहा है वो जानने को कोशिश भी नहीं करते हैं. आम आदमी अपनी रोजी-रोटी की झंझट में राजनीति और सत्ता के इस खेल को पूरी तरह समझ नहीं पाता और आपस में ही लड़ने को मजबूर हो जाता है. उत्तर प्रदेश में चल रहा खेल किसी की सत्ता को बनाये रखने तो किसी की सत्ता में वापसी की लालसा का नंगा प्रदर्शन भर है. यहाँ लोग अमन-चैन को भूल कर सत्ता में बैठे लोगों की चाल में फंस गए हैं. जिन ग्रामीणों को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के बारे में मिल जुलकर संघर्ष करना चाहिये था वो नफरत की मशाल थामकर इन सत्ता के लोभियों के हाथो में खेल रहे हैं.
आजतक के खुलासे के बाद समाजवादी पार्टी और उसके नेताओं के मंशा पर सवाल उठने जायज़ हैं. आज़म खान जैसे बड़े कद के नेता का नाम इस खुलासे में आने के बाद कुछ ज्यादा कहने समझने की जरूरत नहीं पड़ती है. रही सही कसर इस बात से पूरी हो जाती है कि समाजवादी पार्टी के किसी भी नेता पर ऍफ़आईआर दर्ज नहीं होती है. बावजूद इसके कि इस पार्टी के नेता भी उन जगहों पर मौजूद रहे जहाँ भड़काऊ भाषण दिए गए.

मुज़फ्फरनगर में तनाव के बाद दिए गए भड़काऊ भाषण में लगभग सभी पार्टियों के लोग  नजर आये. भाजपा के विधायकों की गिरफ्तारी और उससे पहेले उमा भारती के दिए गए बयान के बाद ये समझना भी ज्यादा मुश्किल नहीं है कि इस खेल के और भी कई आयाम हैं. अन्य नेताओं की गिरफ़्तारी के बाद माहौल और भी ख़राब हो सकता है. और ऐसा किये जाने की पूरी सम्भावना है.

सत्ता का ऐसा दुरूपयोग की मिसाल दूसरी हो नहीं सकती. एक युवा मुख्यमंत्री जिसमे जनता को अपार सम्भावना दिखी थी, जिसे बड़ी उम्मीदों के साथ उन्होंने राज्य का बागडोर पूर्ण बहुमत के साथ सौंपा था आज अपने को पूरी तरह ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं. पिछले एक साल में सांप्रदायिक तनाव के हुए मामले प्रशासन में अखिलेश यादव की धीमी पकड़ को दर्शाते हैं. मुलायम सिंह यादव चुप हैं और बाकी नेता भाजपा को कोस रहे हैं. पर राज्य की नाकामी के विषय में कोई भी बात नहीं कर रह है.

ये वक्त है उन सवालों को उठाने का कि जब मात्र सांप्रदायिक तनाव हो जाने की बिना पर जब दुर्गा शक्ति नागपाल जैसे ऑफिसर को ससपेंड किया जा सकता है तो फिर इतने लोगों की लाशों पर भी क्यों उन नेताओं को क्यों संदेह का लाभ देकर गिरफ्तार नहीं किया जा रहा है. लोकसभा चुनाव नजदीक है अखिलेश सरकार और समाजवादी पार्टी को कई जवाब देने होंगे. इनमे सबसे बड़ा सवाल ये है कि असली मुख्यमंत्री आखिर है कौन?

सुलग रहे उत्तर प्रदेश में उम्मीद है आने वाले दिन शांतिपूर्ण होंगे और लोगों का विश्वास बहाल होगा. पर ये तभी हो सकेगा जब ये भूल कर कार्रवाई की जाए कि व्यक्ति किस दल से जुड़ा है.

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