फंसते आसाराम

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Aasharam.jpgभारतीय संस्कृति में गुरुओं को श्रेष्ठ बताने की कहानियां भरी पड़ी है. उन्हें माता, पिता और अन्य रिश्तेदारों से काफी ऊपर रखा गया है. कई उदाहरण तो उनके भगवान से भी श्रेष्ठ बताने के हैं. पर लगता ऐसा है कि बदलते समय के साथ इन बातों के मायने बदल गए हैं. आज ऐसे कलयुगी गुरुओं की बाढ़ सी आ गयी है जिन्हें न तो गुरु की परिभाषा मालूम है न ही गुरु-शिष्य परंपरा का ज्ञान. इन गुरुओं में अब धार्मिक गुरुओं का नाम भी जुड़ने लगा है. आसाराम जैसे कथावाचक पर लगे इल्जामों की फेहरिस्त इसी बहस को आगे बढ़ता है कि हमारी परम्पराएं कहीं खोती जा रहीं हैं, हम अन्दर से खोखले होते जा रहे हैं.
जिस तरह एक के बाद एक खुलासे हो रहे हैं वो धर्म और समाज दोनों पर से भरोसा उठाने के लिए काफी हैं. जिस तरह से धर्म के नाम पर घिनौना खेल खेला जा रहा है वो हमें आत्मचिंतन करने पर मजबूर करता है. ये सच है कि हर समाज में अच्छे लोगों के साथ-साथ बुरे लोगों का भी प्रतिनिधित्व होता है मगर हम समाज में ऊँचे बैठे लोगों से ये अपेक्षा जरूर करते है कि वो समाज में सकारात्मक रूप से योगदान देंगे. मगर जब आसाराम जैसे लोगों पर इलज़ाम लगता है तो मन कहीं डोलता है. हर व्यक्ति को शक की निगाह से देखना शुरू करता है. अपनत्व की भावना को कम करता है और वातावरण को विषाक्त बनाता है.

लाखो श्रद्धालु और भक्त आसाराम के पास इस उम्मीद में आते होंगे कि वो उनके मन को शांत करेगा. उन्हें उनकी समस्याओं से छुटकारा दिलाएगा. उनकी आस ये होती होगी कि वो इन सत्संगों में भाग लेकर भगवान के करीब आ पायेंगे और संसार के दुख-दर्द से कुछ समय के लिए ही सही दूर हो जायेंगे. पर जिस तरह के खुलासे हो रहे उसे देख कर ऐसा नहीं लगता कि आशाराम के सारे अनुयायी उनके पास आकर अपने को बेहतर महसूस किये होंगे. कईयों के आँखों की नींद और रातों का चैन ख़त्म हो गया होगा.

ऐसा नहीं है की ये किस्सा यहीं तक महदूद होगा. इस हमाम में अभी और कई नंगे मौजूद होंगे. ये सभी धर्मों में मौजूद होंगे, सभी शहरों में मौजूद होंगे. हमारे देश की बहुसंख्य आवादी धर्म के नाम पर बड़ी जज्बाती है. वो धर्म के नाम पर मिटने और मिटाने दोनों के लिए तैयार मिलते हैं. ऐसे ही लोगों का दोहन और शोषण धर्म के ठेकेदार करते हैं. समाज और धर्म का इससे विकृत रूप हो ही नहीं सकता.

आज जरूरत समाज में जागरूकता बढ़ाने की है ताकि आम लोग ऐसे ठेकेदारों की चंगुल में नहीं फंस सके. साथ ही साथ अपने अन्दर झाँकने का भी समय है की ऐसे ठेकेदारों की कुछ गलतियों के बावजूद हम क्यों उन्हें समाज में मान-सम्मान देते हैं? जिस दिन इस प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा उस दिन ऐसे लोग खुद पैदा होना बंद हो जायेंगे.

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