गिरता रुपया

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1rupee.jpgहर चढ़ने वाला गिरता है और हर गिरने वाला चढ़ता है, ये कहावत हम हमेशा से सुनते आये है. मगर हमारे देश में भ्रष्टाचार और लालच लगातार चढ़ाई चढ़ते जा रहे है उतरने का नाम नहीं ले रहे, वहीँ नैतिकता और रुपये का डॉलर के मुकाबले मुल्य लगातार गिरते जा रहे है चढ़ने का नाम नहीं ले रहे. रुपये के गिरते मुल्य को लेकर हो-हल्ला पिछले कुछ दिनों से लगातार मचाया जा रहा था मगर इसको मजबूती की ओर ले जाने की कोई कारगर कोशिश नहीं हुई. अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के रहते हुए रुपये की इस दुर्दशा पर जहाँ विपक्ष चुटकी ले रहा है, बाज़ार लगातार गिरावट के दौर में है वहीँ आम जनता हैरान और परेशान है कि महंगाई और कितना उनके जेब को जलाएगी.
अर्थव्यवस्था बिलकुल ध्वस्त दिख रही है. जरूरी चीजों के दाम लगातार बढ़ते जा रहे हैं. सरकार वित्तीय घाटे को कम कर पाने में असफल साबित हो रही है. नये आर्थिक सुधार दिख नहीं रहे हैं.  चुनावी वर्ष होने के कारण कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा तो हो रही है मगर उसका प्रभाव क्या पड़ रहा है ये शायद सरकार अभी नहीं सोच रही है. टैक्स देने वाला मध्यम वर्ग इन सबके बीच पिस रहा है. उसे न तो बड़े कॉर्पोरेट घरानों की तरह टैक्स में छुट मिलेगा न ही गरीबी रेखा के नीचे बसर करने वालों की कल्याणकारी योजनायें नसीब होंगी. उसके लिए तो सरकार की झोली में बस पेट्रोलियम पदार्थों और घरेलु गैस के दामों में वृद्धि ही है. रुपये के घटे मुल्य ने एक बार फिर से इन उत्पादों के दाम में बढ़ोत्तरी के सम्भावना को बढाया है. नौकरियों के जाने की सम्भावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता. मंदी से सबसे ज्यादा प्रभावित नौकरी पेश ही होते हैं.

डॉलर के बढ़ने से विदेशों से आने वाली हर सामग्री के कीमत में वृद्धि होगी. विदेशों में पढाई, इलाज़ सब महंगा हो जाएगा. पहले से ही लुटी-पिटी जेब पर पड़ रहा ये हमला आम जनता की चैन के साथ-साथ नींद भी छीन लेने वाला है. सरकार के वरिष्ठ नेतागण पहले ही जनता को 5 रुपये और 12 रुपये का खाना खिला कर उनके जख्मों पर नमक छिड़क चुके हैं.

आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कल्याणकारी योजनायें ही इस अर्थव्यवस्था की मंदी के पीछे हैं? बड़ी-बड़ी योजनायें मनरेगा और खाद्य सुरक्षा बिल इतना पैसा गटक रही है कि घाटे को पूरा कर पाना संभव नहीं है? क्या योजनायें सिर्फ राजनितिक लाभ के लिए बनाये जाते हैं? क्या उनका आर्थिक और सामाजिक पहलु सोचा नहीं जाता?

काफी सवाल हैं जिसके जवाब सरकार को तलाशने होंगे. टैक्स का ढांचा जो चरमरा गया है उसे बदलना होगा. बिना टैक्स के ढांचे में बदलाव किये बगैर कोई भी आर्थिक सुधार अपना असर नहीं छोड़ेगा. इसके लिए केंद्र के साथ-साथ राज्य सरकार और सभी दलों को एक साथ सामने आने की जरूरत है. तभी एक अच्छा सन्देश जनता के बीच जाएगा वरना इस समय जो हालत है वो किसी तूफ़ान से पहले के है.

उम्मीद है सभी राजनेता इस बार मध्यम वर्ग के लिए भी सोचेंगे और एक ऐसी समग्र निति का विकास करेंगे जिससे समाज का सभी वर्ग लाभान्वित हो.

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