बहुलतावाद की चुनौती

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kishtwar.jpgबहुलतावाद जहाँ हमारे देश को ख़ूबसूरत गुलदस्ते का शक्ल देता है वहीँ दूसरी ओर ये ये कभी-कभी गंभीर चुनौती भी पेश करता है. हमारे देश में जहाँ विभिन्न सम्प्रदायों के बीच भाईचारे का इतिहास रहा है वही दूसरी ओर आपसी कटुता और भयानक दंगों का भी माहौल रहा है. आज़ादी के वक्त और उसके बाद हुए कई दंगे हमें इस बहुलतावाद की दागदार तस्वीर दिखाते हैं. इन दिनों भी ये बहुलतावाद अपनी बेरंग तस्वीर के साथ एक बार फिर हमारे सामने खड़ा है. जम्मू कश्मीर के किस्तवाड़ से लेकर बिहार के नवादा तक में सांप्रदायिक सद्भाव तार-तार है. अपने ही बेगाने बन गए हैं, धर्म के नाम पर एक-दुसरे को निशाना बना रहे हैं.
ऐसा नहीं कि ये सिलसिला अब शुरू हुआ हो. पिछले एक सालों में तनाव की घटनाएं  लगातार सामने आ रही थी. उत्तर प्रदेश से लेकर बंगाल और असम तक हर जगह तनाव का माहौल बना हुआ था. खास कर उत्तर प्रदेश में माहौल लगातार बिगड़ा है. छोटे-बड़े झडपों को अगर मिला दिया जाए तो वहां आंकड़ा 100 को पार कर जाता है. ये स्थिति काफी चिंताजनक है. वहीँ महीनों चले असम के दंगे आज भी देश को डरते हैं. राज्यों की सरकार के लिए ये एक चुनौती की तरह मुंह बाए सामने खड़ी है. पर अफ़सोस कि इसे संवेदनशीलता से निपटने के बजाय इस पर राजनीति की जा रही है.

nawada.jpgबिहार में भी दंगों एक लम्बा इतिहास रहा है. आज भी कई इलाके अति संवेदनशील के रूप में गिने जाते हैं. नवादा भी उनमे से एक है. यहाँ से तनाव की खबरें भी लगातार आ रही थी. एक चिंगारी पुरे फूस को जल सकती है ऐसी स्थिति थी. और हुआ भी वही तनाव के माहौल में पुलिस की कार्रवाई से हुई मौत के बाद नवादा सुलग रहा है. कमोबेश यही स्थिति बेतिया की है. सांप्रदायिक तनाव बिहार में घर कर रहा है.

किश्तवाड़ की स्थिति भी तनावपूर्ण है. ईद के बाद से ही हो रहे हिंसा और आगजनी में जान-माल का भारी नुकसान हुआ है. कश्मीर के लिए ये नई बात नहीं है. 1990 के दशक में कश्मीरी पंडितों का विस्थापन ये देश देख चूका है. आज भी वहां की फिजाओं में भारत विरोधी नारे लगते है. मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला इन बातों को स्वीकार करते हैं पर लगता है जैसे इसे रोकना उनके बस की बात नहीं. राजनीति हावी है. बिहार, उत्तर प्रदेश, असम, बंगाल और जम्मू कश्मीर सभी एक जैसे नज़र आ रहे है.

चुनावी साल होने के कारण छोटी से छोटी बात का भी बतंगड़ बन रहा है. ऐसे दंगों या झडपों से निपटने के लिए कोई व्यापक नीति न होने के कारण राजनीति करने की पूरी सम्भावना बन जाती है. और वो हो भी रही है.

हमें बहुलतावाद को एक नई परिभाषा देनी होगी जिससे ये लोगों को आपस में जोड़े. अगर आज हम इसे परिभाषित न कर पाए तो ये एक ऐसा मजाक बन कर लोगों के सामने आएगा जो सिर्फ तोड़ेगा, और सिर्फ तोड़ेगा.

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