गिरता स्तर

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Tharoor_Modi.jpgआरोपों और सफाइयों के इस दौर में में ऐसा लग रहा हैं जैसे सारी मर्यादाएं टूट सी गयी हों. अरविन्द केजरीवाल और उनकी टीम ने कहा था कि वो राजनितिक दलों के बीच एक अघोषित समझौता तोड़ रहे हैं. एक-दुसरे के खिलाफ न बोलने की जो रेखा खिंच गयी थी उसे मिटाने के संकल्प के साथ वो मैदान में आये थे. उन्हें कामयाबी जल्दी मिलेगी ऐसा लगता नहीं था पर चुनावों में दिए जा रहे बयानों से लगता है कि वो कामयाब हो रहे है. शायद वो समझौता सचमुच टूट गया सा लगता है. कम से कम कांग्रेस पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच मच रहे बयानों के घमासान के बाद तो ऐसा ही लगता है. इन बयानों में राजनितिक आरोपों की फेहरिस्त अब कम होती जा रही है और निजी जिंदगी के किस्से सरेआम किये जा रहे हैं. यही नहीं जो बातें विवादों से परे भी है उसे नमक मिर्च लगाकर कुछ ऐसे पेश किया जा रहा है मानो विवाद और राजनीति दोनों का अब एक-दुसरे के बिना गुजरा नहीं है.
विवाद नरेंद्र मोदी और शशि थरूर के बीच चल रहे जुबानी जंग का है. इस विवाद से बचा जा सकता था. मगर जान-बूझकर इसे तूल दिया गया ताकि सियासत की दूकान चमकती रहे. अब सवाल ये सामने आता है कि क्या किसी नेता के व्यक्तिगत जिंदगी को चुनावी सभा में कुछ इस तरह उछाला जा सकता है? क्या चंद वोटों के लिए किसी पर कीचड़ उछालना इतना चाहिए? बयानवीरों के इस उभरती जमात के लगता है सब कुछ जायज़ है. प्रधानमंत्री पद के दावेदार मोदी, विकास का दम भरने वाले मोदी, दूसरों को ज्ञान और अनुशाशन का पाठ पढ़ने मोदी ने पता नहीं क्यों एक ऐसा बयान दे दिया जिसके आपत्तिजनक होने में कोई कसर नहीं है. उन्होंने एक सवाल पूछा जिसके अपने मायने है पर उसके पूछने के तरीके हमारे लोकतंत्र के लिए कतई भी माकूल नहीं है.

शशि थरूर ने जवाब दिया एक ऐसा जवाब जो भावनात्मक रूप से सही तो ज़रूर है मगर उन सवालों का जवाब नहीं देते जो कि उनके दुबारा मंत्री पद मिलने के औचित्य को सही साबित करता. ये मुद्दा तो इस जवाब के सहारे समाप्त हो गया होता मगर हमारे सियासतदान किसी भी मुद्दे को खींचने और जनता को भरमाने में लगता है जैसे महारत से हासिल करते जा रहे हैं. मुख्य पात्रों नरेंद्र मोदी और शशि थरूर के बाद अब बारी बाकी के पात्रों की थी इसलिए मुख्तार अब्बास नकवी और दिग्विजय सिंह की थी एंट्री हुई. इन दोनों ने वो काम कर दिखाया जो मुख्य पात्र नहीं कर पाए थे. अपने-अपने पाले के लोगों को बचने लिए जिन कुतर्को का इस्तेमाल किया जा रहा है उसे देखकर लगता नहीं है कि इन सियासतदानों के सहारे भारतीय लोकतंत्र को परिपक्वता मिल सकेगी.

काश चरित्र हनन का मतलब हमारे सियासतदान समझ पाते. निजी जिंदगी और सार्वजनिक जिंदगी के बीच की रेखा को ये लोग देख पाते. चुने जाने वाले हामे माननीयों का ये चेहरा देखकर जनता परेशां जरूर है मगर हैरान नहीं है. लगातार गिरते सियासत के स्तर में ये दिन देखने की कल्पना तो जनता ने कर ही ली होगी. इसलिए वो इस दौर के मज़े उठा रही है. इसे देखते हुए लगता नहीं आरोपों के इस सियासत दौर अभी रुकने वाला है.

इसी मौसम में सुब्रमण्यम स्वामी ने भी अपने तरकश से कुछ तीर निकल कर छोड़ दिए है. इन तीरों का रूख उन्होंने कांग्रेस मुख्यालय की और मोड़ दिया है. उन्होंने राहुल और सोनिया पर कई इलज़ाम लगाये है. राहुल गाँधी की ओर से जवाब आया है और कड़ा जवाब आया है. अब इन आरोपों में दम है या राहुल की सफाई में ये तो आगे पता चलेगा मगर इस लगातार चलने वाले खेल को एक और एपिसोड मिल गया है. यानि एक और चरित्र हनन का कार्यक्रम तैयार है. उम्मीद की जानी चाहिए कि ये एपिसोड भी हंगामाखेज होगा और जनता और मीडिया को इसमें भी मजा आएगा.

आने वाले दिनों में अरविन्द केजरीवाल, सुब्रमण्यम स्वामी, दिग्विजय सिंह और न जाने इनके जैसे कितने ही राजनीति के धुरंधर नए-नए इल्जामों की फेहरिस्त पेश करेंगे. अगर ये अपना स्तर न गिरायें और निजी हमले से बचे तो भारत के नागरिक और मुंह छुपाता लोकतंत्र दोनों की आबरू बच जायेगी.

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स्तर नेताओं का नहीं हमारा गिर रहा है. नेता भी तो हमारे बीच के ही है. क्या हमारी जिम्मेवारी नहीं बनती कि ऐसे बयानों को ख़ारिज किया जाये. आपने ठीक कहा लोग बस मजे लेते हैं.

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