दो मुख्यमंत्री

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nitishmodi.jpgदेश के दो मुख्यमंत्री, जो अपने प्रदेशो के विकास की दुहाई देते नहीं थकते, आज-कल यात्रा पर है. नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार, जो एक दुसरे के धुर विरोधी समझे जाते है, एक साथ जनता की नब्ज़ टटोलने की कोशिश कर रहे है. गुजरात में चुनाव काफी नजदीक है इसलिए मोदी की सक्रियता समझी जा सकती है. पर ये यात्रायें मुख्य रूप से 2014 से पहले अपने आप को तौलने की कवायद है . प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी की दावेदारी का विरोध करके नीतीश ने एकाएक अपना कद बढ़ा लिया था. मीडिया के कई घड़े नीतीश को भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखने लगे. पर आज उनके अधिकार रैली में हुए हंगामे से पता चलता है की दिल्ली अभी दूर है.
अपने ही राज्य में हुए जबरदस्त विरोध के बाद शायद नीतीश को आत्मविश्लेषण करना होगा. आखिर इतने ताम-झाम के बाद उनकी यात्रा शुरू हुई थी. इस यात्रा के सफल होने की पूरी उम्मीद नीतीश के साथ-साथ उनके पार्टी को भी थी. पर हंगामा दर हंगामा ने ने इस यात्रा के साथ-साथ नीतीश की लोकप्रियता पर भी सवालिया निशान लगा दिया है. कहने को तो ये हंगामा नियोजित शिक्षकों के द्वारा किया जा रहा था पर इसमें जनाक्रोश भी शामिल रहा. राज्य आज भी मूलभूत सुविधाओं से दूर ही है. बिजली, पानी, जलजमाव की समस्या राजधानी समेत पूरे बिहार में मौजूद है.

विरोध प्रदर्शनों के बीच नीतीश का काफिला चलता रहा. और सभाओं में उनका मुंह भी चलता रहा. उन्होंने नियोजित शिक्षकों को अपने मंच से ही धमकी दे डाली. यानि उनकी अधिकार रैली में जब किसी ने अपने अधिकार की बात की तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया. लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन का अधिकार है. विरोध भी शालीनता से होनी चाहिए. जूते-चप्पलों को दिखाना कहीं से भी जायज नहीं है. पर एक राज्य के मुख्यमंत्री और जिम्मेवार मुख्यमंत्री होने के नाते उन्हें धैर्य नहीं रखना चाहिए था.

अधिकार रैली करने के पीछे बहुत सारे मुद्दे रहे हैं. बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिले इस कारण ये यात्रा शुरू कि गयी थी. पर इसी यात्रा के बहाने नीतीश अपना शक्ति प्रदर्शन भी करना चाहते थे. रैली के बहाने केंद्र सरकार पर दवाब बनाना भी उनकी एक रणनीति है. पर आज हुए हंगामे ने उनके सारे इरादों पर जैसे ब्रेक सा लगा दिया है.

दूसरी और नरेंद्र मोदी भी अपनी सभाओं में गरज रहे है, बरस रहे है. पर उनका ये गरज-बरस केंद्र सरकार के खिलाफ है. अपनी हर सभा में वो केंद्र सरकार को घेर रहे है, उनकी नीतियों का बखिया उधेड़ रहे है. वो भी पूरो शक्ति के साथ अपनी ताकत बढ़ाने में लगे हुए है. वहां के माहौल को देखते हुए ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अगर चुनावों में उन्होंने आशातीत सफलता पा ली तो उनका कद कई गुना बढ़ जाएगा.

लोकतंत्र में जनता से संवाद करना हर राजनीतिज्ञ चाहता है. ये दोनों भी उससे इतर नहीं है. पर लोकप्रियता और सफलता अगर सर चढ़ कर बोलने लगे तो जनता द्वारा बनाये गए नेता शायद ये नहीं जानते कि वो जनता ही है जो इन्हें सर पर बैठते है और वो जनता ही है जो इन्हें धुल फांकने पर भी मजबूर करती है.

दोनों को लेकर बहस जारी है और जारी रहनी भी चाहिए आखिर देश का सवाल है. भविष्य का नेता के रूप में इनके हर गुण-अवगुण कि विवेचना की जानी चाहिए ताकि देश एक सक्षम और दृढ नेता पा सके.  विकास और सुशासन के लिए मीडिया में मशहूर दोनों मुख्यमंत्रियों के परीक्षा कि घडी नजदीक गयी है. जनता तय करने के लिए बेचैन होगी कि देश का भविष्य इनके हाथों में सुरक्षित होगा या नहीं.

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मोदी जी की तुलना नितीश से ठीक नहीं. दोनों में अंतर है.

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