modi_tday.jpgकई व्यक्ति है जो अपना पूरा जीवन कुछ करने का सपना देखते हुए गुजार देते है। कई व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो अपने से ज्यादा दूसरा क्या कर रहा है इस पर ज्यादा ध्यान देते है। इन सब से परे कुछ लोग सिर्फ करने में यकीन रखते है। वे आलोचनाओं से घबराते नहीं हैं। भविष्य देखने की क्षमता उनमे अन्य लोगों के मुकाबले बेहतर होती है। ऐसे लोगों में अब शुमार नरेंद्र मोदी को भी किया जा सकता है। शिक्षक दिवस के मौके पर उन्होंने बच्चों के बीच जिस सरल भाषा में अपने आप को प्रस्तुत किया वो एक ऐसी पहल थी जिसे आज से पहले कोई नहीं कर पाया था। विरोधी भले ही इसे एक पी आर एक्सरसाइज के रूप में देख रहे हों मगर इस रूप में भी बच्चों तक पहुँच पहले किसी भी राजनीतिज्ञ ने नहीं बनाई थी।
poster.jpgपिछले साल दिसंबर में जनता ने दिल्ली में जो खंडित जनादेश दिया था वो आज भी उनका उनका पीछा कर रहा है। इसके विपरीत देश में पूरी की पूरी राजनीति बदल गयी। एक पार्टी को जनता ने पूर्ण बहुमत दिया जो कि सरकार चला रही है और शायद जनता को इस बात का इत्मीनान है कि अच्छा या बुरा चाहे जो भी हो कम से कम राजनीतिक अस्थिरता तो नहीं रहेगी। देश का ये मिजाज ऐसा लगता है कि दिल्ली को देखकर ही आया होगा। तीन पार्टियों के बीच पीस रही दिल्ली की जनता राजनीतिक अस्थिरता का एक ऐसा दौर देख रही है जो उनके लिए बेहद घातक है।
swaroopanand-sai-baba.jpgविवादों का आगमन कब और कैसे होगा कोई नहीं जानता है। हमारे देश का आम आदमी, जो अपने बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में दिन रात लगा रहता है, विवादों से हमेशा दूर रहना चाहता है। राजनीतिक और अपराधिक विवादों की जिस देश में बहुतायत हो वहां ऐसा करना आम आदमी के लिए शायद उचित भी है। मगर इस बार विवाद थोड़ा हटकर है। विवाद धार्मिक है। विवाद साईं बावा से जुड़ा हुआ है। जो व्यक्ति अपने जीवन शायद किसी विवाद में न पड़ा हो उसे पहले तो देशवासियों ने मंदिर में पूजा के लिए रखकर भारी इज़्ज़त दी और अब इसी देश में उनके पूजा होने और भगवान होने पर बहस की जा रही है।
ramdev.jpgजहाँ देश चुनावों में अपना भविष्य खोज रहा है वहीं नेता अपनी बदजुबानी से आम लोगों के बीच एक नकारात्मक छवि बना रहे हैं। चुनावों को जीतने की बेचैनी ने एक ऐसा माहौल बना दिया है जहाँ मुद्दे बिलकुल गौण हो गए हैं और व्यक्तिगत टिप्पणियां हावी हो गयी हैं। ये हमले ऐसा नहीं है है कि कोई खास दल या खास नेता कर हों। ये बीमारी कमोबेश सभी दलों में और सभी नेताओं में सामान्य रूप से व्याप्त है। चाहे नरेंद्र मोदी पर उनके शादी को लेकर हुए हमले हों या फिर मनमोहन सिंह पर की जा रही टिप्पणियाँ, सभी आहात करने वाली हैं। राजनीति के स्तर को और भी नीचे गिराने वाली हैं। इन सभी के बयानों में एक और नाम जुड़ गया है बावा रामदेव का। रामदेव ने राहुल गांधी पर अभद्र टिप्पणी कर इस गिरावट का स्तर बढ़ाया ही है।
mnvsak.jpgस्वयंवर की पूरी तैयारी हो चुकी है। दुल्हन सजी-धजी तैयार बैठी है, बारात में आने को लोग तैयार है और दूल्हों का जमावड़ा भी लगभग तय हो चूका है। जी हाँ बात हो रही है काशी नगरी की। चुनाव को लेकर जो सरगर्मियां है वो किसी स्वयंवर से कम नहीं है। नरेंद्र मोदी और अरविन्द केजरीवाल किसी दुल्हे से भी ज्यादा आतुर दिखाई दे रहे हैं और महादेव की नगरी इस रोमांचक मुक़ाबले को देखने के लिए बेताब है। कांग्रेस में उम्मीदवार को लेकर कुछ उहापोह नज़र आ रही है मगर अपुष्ट ख़बरों को अगर सच माना जाये तो दिग्विजय सिंह भी यहाँ से ताल ठोक सकते हैं। अगर उम्मीदवारों कि लिहाज़ से वराणसी को देखा जाए तो ये कहना गलत नहीं होगा कि इस आम चुनाव में जनता की तवज्जो सबसे ज्यादा वाराणसी में ही रहने वाली है।
arvind-kejriwal.jpgचुनावों की राजनीति में अपने पैर जमाने की आम आदमी पार्टी पूरी कोशिश कर रही है। अपने पहले ही प्रयास में दिल्ली की गद्दी पर बैठ जाने वाली आम आदमी पार्टी पुरे देश में अब अपना आधार भांपने कि कोशिश में लग गयी है। उनके हर नेता का यही प्रयास दिख रहा है कि वो कैसे राष्ट्रीय परिदृश्य में अपने आप को उभारें। पहले कुमार विश्वास द्वारा राहुल गांधी को चुनौती दिया जाना और उसके बाद अरविन्द केजरीवाल का सुशील कुमार शिंदे पर प्रहार इसी प्रयास की कड़ी भर है। अब इन प्रयासों से आगे बढ़ कर अरविन्द केजरीवाल ने सभी दलों के तथाकथित भ्रष्टाचारियों कि एक सूचि जारी की है। भले ही इस सूचि में मौजूद लोगों के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत आम आदमी पार्टी या अरविन्द केजरीवाल के पास नहीं है पर फिर भी इलज़ाम लगाने में कोताही नहीं बरता गया है।
pbhushan.jpgकहते हैं कि धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होये, माली सींचे सौ घड़ा ऋतु आये फल होये। पर ऐसा लगता है कि आम आदमी पार्टी बहुत जल्द बहुत कुछ पा लेना चाहती है। पार्टी के नेता ऐसे-ऐसे बयान दे रहे है मानो उन्हें बहुत कुछ कह लने की जल्दी हो। दुसरे पार्टियों को नैतिक सलाह देने वाली आम आदमी पार्टी इस बार प्रशांत भूषण के कश्मीर पर विवादित बयान के बाद बैकफूट पर है। पार्टी ने भूषण के बयान से अपनी दूरी बना ली है पर उनका बयान पार्टी को नुकसान जरूर पहुंचा सकता है। भूषण ऐसे बयान पहले भी देते आये हैं पर राजनीतिक पार्टी बनने के बाद वो अपने विरोधियों के साथ-साथ मीडिया के निशाने पर भी हैं।
tarun-tejpal.jpgकहते हैं कि न्याय पाना सभी का संवैधानिक अधिकार है। पर कई बार न्याय पाने के लिए भारी मशक्कत करना पड़ता है। इसके लिए हिम्मत जुटानी पड़ती है, समाज के तथाकथित नामी-गिरामी लोगो से लड़ना पड़ता है। तहलका के तरुण तेजपाल के खिलाफ अपनी शिकायत दर्ज करने के बाद उस बहादुर लड़की को भी भारी मशक्कत करना पड़ रहा है। तरुण तेजपाल पुलिसिया गिरफ्त में आ तो जरूर गए हैं मगर इससे बचने के लिए उन्होंने जो रास्ते अपनाये है उससे ये एहसास हो जाता है कि न्याय पाने की डगर आसान नहीं रहने वाली है। पर न्याय की आस लगाये लड़की की हिम्मत देखकर लगता है कि देर-सवेर ही सही न्याय जरूर मिलेगा।
AAP.jpgराजनीति की परिभाषा इस चुनावी माहौल में आरोप-प्रत्यारोप और छींटाकशी तक सीमित हो गया है। इस माहौल का असर सभी पार्टियों पर है। दिल्ली में होने वाले विधानसभा चुनाव में इसका असर सबसे ज्यादा है। यहाँ मैदान में उतरने वाली तीनो बड़ी पार्टियां एक-दुसरे पर कीचड़ उछालने का कोई भी मौका नहीं छोड़ रही है। हालिया मीडिया सरकार का किया गया स्टिंग ऑपरेशन इस माहौल को और गन्दा कर रहा है। आम आदमी पार्टी पर किये गए इस स्टिंग ऑपरेशन के बाद पार्टी के नेताओं ने दुसरे दलों पर कुछ गम्भीर इलज़ाम लगाये हैं।
sardar-patel-statue-of-unity.jpgबेतुके बहस करना और उसमे देर तक उलझे रहना कोई भारतीयों से सीखे।स्वतंत्र भारत के पहले गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल के बारे में चल रहा ताजा बहस दोनों बड़े राष्ट्रीय पार्टियों से होते हुए अब मीडिया चैनलों में बैठे हुए बुद्धिजीवियों तक पहुँच गया है। लोग चर्चा इतिहास की करने लगे हैं। नेहरू और पटेल के बीच के रिश्तों को खंगाला जा रहा है, यहाँ तक कि बात सेकुलरिज्म तक पहुँच गयी है। नरेंद्र मोदी सरदार के सेकुलरिज्म के बारे में बता रहे हैं और दुसरे इस पर अपनी राय रख रहे हैं। इन सबके बीच सरदार किसके है इसकी चर्चा बड़े जोरों पर है चुनावों के अलावा अब कांग्रेस और भाजपा में विरासत को लेकर भी प्रतिस्पर्धा शुरू हो गयी है।

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