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जनता के नब्ज को पकड़ पाने का इल्म शायद अभी भी हमारे देश में मीडिया और बुद्धिजीवियों के बस की बात नहीं है। लोकसभा के चुनावों में अपार सफलता पाने वाली भाजपा दिल्ली के चुनावों में अपना वजूद बचाने का संघर्ष करती दिखी। न तो लोकसभा चुनावों में न ही इस विधानसभा चुनाव में कोई जनता के मूड को सही-सही टटोल सका। केजरीवाल की सफलता ने साबित कर दिया कि कोई भी पाटभर्् जनता को हल्के में नहीं ले सकती। जनता का प्यार कब किसे मिल जायेगा ये शायद जीतने वाली पार्टियां भी सही-सही नहीं बता सकती है।
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जनता के नब्ज को पकड़ पाने का इल्म शायद अभी भी हमारे देश में मीडिया और बुद्धिजीवियों के बस की बात नहीं है। लोकसभा के चुनावों में अपार सफलता पाने वाली भाजपा दिल्ली के चुनावों में अपना वजूद बचाने का संघर्ष करती दिखी। न तो लोकसभा चुनावों में न ही इस विधानसभा चुनाव में कोई जनता के मूड को सही-सही टटोल सका। केजरीवाल की सफलता ने साबित कर दिया कि कोई भी पाटभर्् जनता को हल्के में नहीं ले सकती। जनता का प्यार कब किसे मिल जायेगा ये शायद जीतने वाली पार्टियां भी सही-सही नहीं बता सकती है।
devendraf.jpgहरियाणा और महाराष्ट्र में आये ताजा परिणामों से एक बात तो साफ़ हो ही जाती है कि भाजपा का का ग्राफ अभी ऊपर की ओर जा रहा है। दोनों राज्यों में भाजपा का आधार काफी कम था। खासकर हरियाणा में तो भाजपा को कभी भी गंभीरता से नहीं लिया गया था। पर इन नतीजों ने एक बार फिर से देश के विश्लेषकों में पेशानी पर बल डाल दिया है। कई इसे मोदी की जीत बता रहें हैं तो कइयों को यहाँ मोदी लहर का खत्म दिख रहा है। स्पष्ट है मीडिया और विश्लेषक इस समय दो विभिन्न प्रकार की भाषाएँ बोल रहे हैं। भाजपा विरोधी और भाजपा समर्थक शायद मीडिया भी दो भागों में बंट गया है। ये विभाजन लोकतंत्र कर लिहाज़ से कोई सार्थक छवि पेश नहीं कर रहा है पर शायद देश को मीडिया का ये चेहरा कुछ और समय के लिए देखने को मिल सकता है।
all-party1.jpgराजनीति में संभावना तो हमेशा से देखी जाती रही है पर संभावनाओं पर राजनीति भी महाराष्ट्र में जबर्दस्त ढंग से खेली गई। राज्य की तमाम पार्टियों ने एक मायने में अकेले चलने का फैसला कर लिया है। ऐसा नहीं है कि ये पार्टियां गठबंधन को बनाये रखने की कोशिश कर रही थी बल्कि हर पार्टी कहीं न कहीं गठबंधन को तोड़ने के लिए ही काम कर रही थीं। भाजपा-शिवसेना की विचारधारा पर आधारित दोस्ती हो या कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस का सत्ता बांटने वाली मित्रता सभी संभावनाओं के कारण ही बनी थी। अब जब इस बार गठबंधनों के टूट का मौसम है तब भी संभावनायें तलाशी जा रही है। चारो पार्टियों को यूं तो लगता है कि वक्त उनका है पर क्या ये होे पायेगा इसकी भी चिंता जरूर है।
modi_tday.jpgकई व्यक्ति है जो अपना पूरा जीवन कुछ करने का सपना देखते हुए गुजार देते है। कई व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो अपने से ज्यादा दूसरा क्या कर रहा है इस पर ज्यादा ध्यान देते है। इन सब से परे कुछ लोग सिर्फ करने में यकीन रखते है। वे आलोचनाओं से घबराते नहीं हैं। भविष्य देखने की क्षमता उनमे अन्य लोगों के मुकाबले बेहतर होती है। ऐसे लोगों में अब शुमार नरेंद्र मोदी को भी किया जा सकता है। शिक्षक दिवस के मौके पर उन्होंने बच्चों के बीच जिस सरल भाषा में अपने आप को प्रस्तुत किया वो एक ऐसी पहल थी जिसे आज से पहले कोई नहीं कर पाया था। विरोधी भले ही इसे एक पी आर एक्सरसाइज के रूप में देख रहे हों मगर इस रूप में भी बच्चों तक पहुँच पहले किसी भी राजनीतिज्ञ ने नहीं बनाई थी।
poster.jpgपिछले साल दिसंबर में जनता ने दिल्ली में जो खंडित जनादेश दिया था वो आज भी उनका उनका पीछा कर रहा है। इसके विपरीत देश में पूरी की पूरी राजनीति बदल गयी। एक पार्टी को जनता ने पूर्ण बहुमत दिया जो कि सरकार चला रही है और शायद जनता को इस बात का इत्मीनान है कि अच्छा या बुरा चाहे जो भी हो कम से कम राजनीतिक अस्थिरता तो नहीं रहेगी। देश का ये मिजाज ऐसा लगता है कि दिल्ली को देखकर ही आया होगा। तीन पार्टियों के बीच पीस रही दिल्ली की जनता राजनीतिक अस्थिरता का एक ऐसा दौर देख रही है जो उनके लिए बेहद घातक है।
swaroopanand-sai-baba.jpgविवादों का आगमन कब और कैसे होगा कोई नहीं जानता है। हमारे देश का आम आदमी, जो अपने बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में दिन रात लगा रहता है, विवादों से हमेशा दूर रहना चाहता है। राजनीतिक और अपराधिक विवादों की जिस देश में बहुतायत हो वहां ऐसा करना आम आदमी के लिए शायद उचित भी है। मगर इस बार विवाद थोड़ा हटकर है। विवाद धार्मिक है। विवाद साईं बावा से जुड़ा हुआ है। जो व्यक्ति अपने जीवन शायद किसी विवाद में न पड़ा हो उसे पहले तो देशवासियों ने मंदिर में पूजा के लिए रखकर भारी इज़्ज़त दी और अब इसी देश में उनके पूजा होने और भगवान होने पर बहस की जा रही है।
Modi_RF.jpgआज़ाद भारत ने अपने सफर का एक और साल पूरा कर लिया। तकनीकी दृष्टि से भारत 68 साल का एक नया मुल्क है। पर हकीकत में भारत की सभ्यता हज़ारों साल पुरानी है। अंग्रेज़ों से आज़ादी मिलने से पूर्व भी हमारा देश विदेशी शासकों के अधीन था। 15 अगस्त 1947 को मिली आज़ादी इस मायने में बहुत महत्वपूर्ण थी कि हमारा देश उन विदेशी हमलावरों के चंगुल से निकल कर हम देशवासियों के हाथ आ गया। भले ही हमारी जमीन के दो टुकड़े हो गए मगर दोनों हिस्सों में शासन यहाँ रहने वाले लोगों की ही रही। लोकतंत्र बहाल हुआ और जनता सर्वोच्च बन गयी। जनता अपने बीच से चुन कर प्रतिनिधि भेजती रही जो आज़ादी के अवसर पर देश को लाल किले के प्राचीर से सम्बोधित करता रहा। इसी परंपरा में इस बार बारी थी नरेंद्र मोदी की। लाल किले तक का उनका सफर जनता के समर्थन से ही संभव हो सका।
gopninath-munde.jpgप्रकृति का नियम कभी-कभी समझना काफी कठिन हो जाता है। जिनकी इस संसार में जिस समय सबसे ज्यादा जरूरत होती है वो उसी समय इस संसार को अलविदा कह देते हैं। हमारे देखते समझते हमें वो लोग छोड़ चले जाते हैं जिसकी कल्पना हमने अपने सबसे बुरे सपने में भी न की हो। गोपीनाथ मुंडे का अचानक सड़क हादसे में हुई मौत ने सबको झकझोर कर रख दिया है। अपने राजनीतिक जीवन के सर्वश्रेठ दौर के से गुजर रहे मुंडे शायद रहते तो निकट भविष्य में कई और बुलंदियों को देख सकते थे। पर होनी को शायद कुछ और ही मंजूर था।
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